मेरी कहानियाँ

मेरी कहानियाँ
आर्टिस्ट -सुधा भार्गव ,बिना आर्टिस्ट से पूछे इस चित्र का उपयोग अकानून है।

शुक्रवार, 29 अगस्त 2014

कहानी -4

आखिर माँ जो हूँ /सुधा भार्गव

चित्र -गूगल से साभार 

मैं अपने छोटे से परिवार में बहुत खुश थी। एक बेटा 17 वर्ष का व बेटी 10 वर्ष की  जो अपने भाई पर जान छिड़कती थी । सब अपने –अपने कार्यों के प्रति सजग और शांत ।  पिछले कुछ दिनों से शहर मे पाकिटमारी के एक गिरोह की चर्चा हो रही थी । जिसमें ज़्यादातर 12 वर्ष से 20 वर्ष के लड़के शामिल थे । मुझे अजीब सी दहशत हो गई ,कहीं मेरा बेटा -----न फंस ----।

हम पति –पत्नी काम के चक्कर में सुबह 10 बजे ही घर से निकल जाते । मन का भय प्रकट करते हुए एक दिन मैंने अपने पति से बेटे पर नजर रखने को कहा । शाम को जब वह घर लौट कर आया ,बड़ा थका-थका सा लग रहा था । रोज की तरह न मुझे आवाज दी और न ही  एक कप चाय मांगी । वह बिस्तर पर पड़ गया मानो सारी हिम्मत चूक गई हो ।

मैं तो घबरा गई । प्रश्न सूचक दृष्टि उसकी ओर उठ गई ।
-गिरोह का पता चल गया है । तुम्हारा बेटा भी उसका सदस्य ---है।
मेरी हड्डियों में तो ऐसा दर्द उठा कि  तड़प उठी । जमीन पर ही लुढ़क पड़ती अगर वह मुझे सँभाल न लेता। क्षण भर में मेरे चेहरे पर मुर्दनी छा गई । न जबान हिल रही थी और न शरीर का कोई अंग । कानों को पति की कही बात का विश्वास न हुआ । मैंने सीधे –सीधे  बेटे से ही पूछने का निश्चय किया । अँधियारे की चादर बिछते ही उसने घर में प्रवेश किया । हम दोनों उसे घूरे जा रह थे मानो वह भूत हो।उसकी चाल –ढाल और कपड़े पहनने का ढंग भी अजीब लगा। बीड़ी -सिगरिटी धुएँ के लच्छे उसका पीछा कर रहे थे । उसने बड़े शांत भाव से मान लिया कि वह पाकिटमारी गिरोह का सदस्य है । उसने यह भी स्पष्ट कर दिया कि गिरोह के सारे सदस्य उसकी बात मानते हैं और उसके इशारों पर नाचते हैं । अत : उनको छोडकर वह नहीं रह सकता है।

हमारे पालने में न जाने क्या कमी रह गई थी कि उसने गैरों मे अपनापन खोजा । बेचैनी की बाढ़ में मैं बह चली । बहुत हाथ पैर पटके ।किनारा न मिला  ,बस अपने भगवान को पुकारने लगी ।
रात्रि को सोते समय मैंने अपने पति के सामने इच्छा व्यक्त की –क्यों न गिरोह के सदस्यों को हम अपने घर में आश्रय दे दें । शायद घरेलू वातावरण देख वे जिम्मेदार नागरिक बन जाएँ । किसी न किसी मजबूरी के कारण उन्होंने जेब काटने का धंधा शुरू कर दिया है । मेरी बात सुनकर तो वह बिफर उठा और मुझे पागल करार कर दिया ।

मेरे बेटे का भला इसी में था कि सबको भला बनाने की कोशिश की जाए । किसी भी समय वे पकड़े जाने पर जेल की हवा खा सकते थे । मैंने जब अपने बेटे से कहा –सब यहाँ आकर रहो तो बड़ा खुश हुआ क्योंकि सबको सुरक्षा मिलती ।
उसके दस साथी अगले दिन आन धमके । घर में मुश्किल से तीन कमरे और एक आँगन था । सारा घर म्यूजियम नजर आने लगा । ।शुरू –शुरू में न कोई काम करता और न रसोई के काम में सहायता करता । मेरे पति घर –बाहर का काम करते जाते और इस मुसीबत की जड़ मुझे बताते जाते ।

एक आश्चर्य जनक बात देखने में आई । गिरोह का नेता जूडो –कराटे चैंपियन था । सुबह एक घंटा सबकी अच्छी –ख़ासी कवायद होती ताकि अनुचित काम करते समय वे अपनी सुरक्षा खुद कर सकें । एक दूसरे के लिए मरने –मारने पर उतारू हो जाते थे । झगड़ालू किस्म के व भद्दे शब्दों का प्रयोग करने वाले किशोर कभी –कभी मुझे जानवर लगने लगते ।
स्नेही बयार के झोंकों में मृदुल होना कभी उन्होंने सीखा ही नहीं । । पर उनमें कहीं न कहीं अच्छाई छिपी अवश्य थी जिसे बाहर निकालकर मुझे लाना था ।

एक माह का राशन 10 दिनों में ही खतम हो गया । पैसों का प्रबंध तो करना ही था । मैं खुद भूखी रह सकती थी पर उन्हें भूखा नहीं देख सकती थी ।
नानी की दी हुई मेरे पास एक सिलाई मशीन थी ।जिसे बेकार समझ कर स्टोर में रख दी थी । । उसे साफ किया ,कलपुर्ज़ों में तेल दिया ।अरे,वह तो फर्राटे से चल निकली । रात में छोटे बच्चों के कपड़े सीने का इरादा बुरा न था ।
उस रात मशीन की खड़खड़ से शायद कोई ठीक से न सो पाया । मेरे बेटे के साथी रात भर कुलबुलाते रहे । दिन में जैसे ही कपड़ों को बेचने के इरादे से घर से निकली ,एक लड़के ने मेरी बांह थाम ली । कपड़ों का बंडल लेकर उसके दो साथी साइकिल पर सवार हुए और अलग –अलग दिशाओं की ओर चल दिये। 

रात को खाना हम सब एक साथ ही एक परिवार की तरह बाँट –बांटकर खाते थे । उसी समय मेरी हथेली पर 500 रुपए रख दिये गए । जो लड़के कपड़े बेचकर आए थे उनको मैंने निकम्मों की तरह उनका खाली बैठना  ऊलजलूल  बकना भी अच्छा न लगता था । मैं उन्हें अपना पसीना बहाते हुए देखना चाहती थी ।
दोपहर को दो घंटे सोना लड़कों की आदत होती जा रही थी । कोई भी नौकरी करने को तैयार न था । तंग आकर एक बात मैंने उनसे साफ –साफ कह दी –तुम जीवन भर मेरे साथ रह सकते हो परंतु जेब काटते समय यदि तुम पकड़े गए तो तुम्हें छुड़ाने नहीं आऊँगी । दूसरी बात –तुम्हारी पाप की कमाई से पानी तक इस घर में नहीं आयेगा ।

मेरी बात का इतना असर हुआ कि वे नौकरी ढूँढने लगे । जिसे जो काम मिला अपना लिया । वे कुछ न कुछ रुपए लाकर मेरे हाथ पर रख देते । उनकी आँखों में एक विशेष चमक आती जा रही थी । शायद यह आत्मविश्वास की ज्योति थी । वही मेरी हिम्मत का पतवार बन रही थी ।
मेरी छोटी बेटी जब लड़कों से कहती –भैया –भैया चाय पी लो ।
वे चुपचाप उसकी बात मानते और तुरंत घर के कामों में हाथ बंटाने लगते । कोई सब्जी काटता,कोई बर्तन धोने लगता। 

मेरे आश्चर्य की सीमा न रही जब एक दिन मैं थकी मांदी घर लौटी और देखा –मेरी बेटी आमलेट खा रही  है । थर्मस में मेज पर चाय रखी थी । यह सब किसका करिश्मा है मुझे पूछने की जरूरत नहीं पड़ी क्योंकि पास ही खड़ा एक  लड़का मुझे कनखियों से देख रहा था । मैं जब उसकी ओर देखती वह झट से निगाह नीची कर लेता । उसको भौदल्ला कह कर पुकारते थे । मुझे उसका यह नाम बिलकुल अच्छा नहीं लगता था पर विवशता से यही नाम लेना पड़ा ।
-भौदल्ला,यह आमलेट किसने बनाया ?
-मैंने । रूमा को बहुत भूख लगी थी । आपके लिए चाय भी बनाई है । आप भी तो आंटी बहुत थक गई हो।
-तुमने यह कहाँ से सीखा ?
-आपको रोज बनाते देखता हूँ । आज पहली बार बनाया है ।
तब से मैं सबकी आंटी बन गई । कोई -कोई तो मुझे भावातिरेक में माँ भी कहता। 
एक बात मैं समझ गई अंजान बच्चे अब मेरे होने लगे हैं । वे किसी न किसी तरह मेरी मदद करना चाहते हैं । यह मेरे लिए बहुत संतोष की बात थी ।
मैंने बच्चों को पाँच समूहों में विभाजित कर अलग अलग काम सौंप दिये । मैंने कभी उनके दोषों पर ध्यान नहीं दिया । उनके नाम भी बदल दिये जिनका कुछ न कुछ विशेष अर्थ होता था । मजे की बात कि वे अपने को नाम के अनुरूप ही ढालने लगे ।मैंने एक का नाम प्रेम रखा । उस झगड़ालू का बात करने का तरीका ही बदल गया । उसकी आवाज ,उसका एक –एक शब्द मोहब्बत का संदेश देने लगा । कोई लड़ाई करता तो उनका निपटारा करने बैठ जाता । मुझे यह देखकर कभी -कभी बहुत हंसी आती । दूसरे लड़के का नाम सत्यप्रकाश रखा । उस मक्कार ,झूठ बोलने वाले लड़के ने सच बोलने की कसम खा ली । सच बोलने के कारण उस लड़के पर डांट भी पड़ जाती पर उसने सच बोलना न छोड़ा ।

बच्चों की आदतें बदलने लगीं । अच्छा खासा सुधार गृह  हो गया मेरा घर । घर का काम –काज लड़के काफी कर लेते थे इसलिए शाम होते ही मैं सिलाई मशीन लेकर बैठ जाती । कुछ दिनों के बाद बचत होने लगी और मैंने दूसरी मशीन खरीद ली । काम अच्छा चल निकला ।
पतिदेव अब तो मेरे उठाए कदम की  सराहना करने लगे । । उनके प्रयास से बैंक से कुछ धन राशि उधार मिल गई । हमने उससे दो कारें व कुछ कंप्यूटर खरीद लिए । लड़कों ने  कंप्यूटर का ज्ञान प्राप्त किया और फिर वही उनकी रोजी रोटी का साधन बन गया । परंतु मैं इतने से ही संतुष्ट न थी। मैं चाहती थी कि लड़के पढ़ लिख कर अपना भविष्य बनाएँ । यह तभी संभव होता जब वे धन कमाने के साथ साथ शिक्षा भी प्राप्त करते । सब लड़के मेरे  सपने  को पूरा करने के लिए कटिबद्ध थे ।
मैंने घर का मोर्चा सँभाला । बच्चे मन से पढ़ने व धन कमाने में जुट गए । मेरे पतिदेव  तन –मन धन से मेरे थे ।हम सब एक किश्ती पर सवार हो गए और बढ़ते ही गए । भँवर में फँसे पर पक्के इरादों के कारण निकल गए और पीछे मुड़कर कभी न देखा ।
एक समय था जब मैंने 12 बच्चों को सँभाला था पर आज मेरे बच्चे हम पति पत्नी को सँभाल रहे हैं । सिलाई करना छोड़ दिया है लेकिन खाना अब भी मैं सब  को खुद ही परोसती हूँ क्योंकि सदैव आशंका बनी रहती है –कहीं मेरे युवा बच्चे कम न खाएं ,दुबले न हो जाएँ ।आखिर  माँ जो हूँ !

सुधा भार्गव 
बैंगलोर 
समाप्त


मंगलवार, 12 अगस्त 2014

कहानी 3



संधिपत्र/सुधा भार्गव 

जंगल में मंगल

"हा--–हा-- घबरा गए मुझे देखकर ।
हाँ !हाँ मैं आदमखोर हूँ । किसे –किसे मारोगे ?कुछ दिनों पहने एक हाथी को गोली मार दी थी । परसों एक चीते को फांसी की सजा सुना दी , और आज मुझ बाघ को कटघरे मेँ खड़ा कर दिया है।पर यह तो बताओ –हमारा कसूर क्या है ?"
"कसूर !चार -चार मासूम बच्चों को गटक गए और पूछते हो कसूर क्या है ?"
"अपनी भूख मिटाने ही को तो बस्ती मेँ आना पड़ा। क्या  भूख मिटाना पाप है !तुमने तो अपनी भूख मिटाने को जंगल के जंगल काट दिये हमारा घर उजाड़ दिया । शाकाहारी जानवरों और दूध मुंहे पक्षियों को तुमने अपना आहार बनाकर हमारे पेट पर लात मार दी । रहे सहे पक्षी और छोटे जानवर जंगल छोड़ दूसरी जगह जाकर बस गए।अरे तुम जिनावर खोरों के कारण ही तो हम आदमखोर पैदा हो गए।
तुम्हारे तीन चार कम हो गए तो बिलबिला उठे । हमारे बारे मेँ कभी सोचा ?
जंग तुमने ही छेड़ी हैं । जंगल मेँ न जाने कितना  रक्तपात हुआ । हमारे अनगिनत भाई –बंधु मारे गए । कितने ही जंगलवासियों के वंश के वंश तहस नहस कर दिये । हरी –भरी  फल –फूलों से भरे वृक्ष धराशायी हो गए।  हरी  मुलायम घास पर और हमारी गुफाओं पर वुलडोजर चलवाकर धरती माँ को कितना रुलाया। तुम्हारे अपराध एक हो तो गिनाएँ। हम जंगली कहलाते हैं पर तुमने जंगलीपना दिखने मेँ कोई कसर न छोड़ी।"

"बहुत बोल लिए  अब चुप लगाओ। हम जानवर ही सही पर हैं शक्तिशाली।तुममे से एक एक को चुनकर मौत के घाट उतार  देंगे । कोई नहीं बचाने आयेगा। तुम हमारा कर ही क्या लोगे ?"
"अपनी ताकत  पर गुमान न करो  । एक को मारोगे दस पैदा हो जाएँगे । भूल गए उन फिरंगियों को जिन्होंने कितनी निर्दयता से हमारे देश मेँ अपना दमन चक्र चलाया था । पर क्या हुआ! एक क्रांतिकारी को मारते थे तो दस पैदा हो जाते थे। एक दिन ऐसा आया कि पूरा देश क्रांति की आग मेँ जल उठा और अंग्रेजों को भारत छोडना पड़ा।अगर जंगल का राजा तुमने खुद बनना चाहा तो  आदमखोर बना पूरा जंगल इस बस्ती पर छा जाएगा। फिर तो तुम्हारा नामोनिशान भी न रहेगा । अब भी समय है चेत जाओ । जंग तुमने छेड़ी है ,तुम्हें  ही इसे रोकना होगा । वरना इस जंग मैं हम सब बर्बाद हो जाएंगे । तुम अपने घर के राजा रहो और हमें अपने जंगल का राजा रहने दो । हम भी खुश तुम भी खुश।"

बस्ती के रहने वालों मेँ शेर की बातों ने दहशत फैला दी।
वे सोचने पर मजबूर हो गए ।
किनारे पर किशोरों की एक टोली थी जिसमें ज़्यादातर आठवीं -नवीं के छात्र थे । वे जानते और समझते थे कि किस तरह से मनुष्य अपने मतलब के लिए जंगल और पशु –पक्षियों का दुश्मन बन बैठा है। उनकी  सहानुभूति शेर के साथ थी । छोटे होने के कारण वे बड़ों के सामने बोलने नहीं पाते थे । लेकिन अब वे अपनी चुप्पी तोड़े बिना न रहे ।
मुखिया का लड़का आगे बढ़कर अपने पिता से बोला –"बप्पा जी ,शेर राजा ठीक ही कह रहे हैं । सब अपनी –अपनी सीमा मेँ रहें तो शांति और सुख दोनों बने रहते हैं । आप दोनों संधि कर लीजिये ।"
"बेटा ,कह तो तू ठीक ही रहा है ।"
"तब लीजिए यह संधि पत्र और कर दीजिए अपने –अपने हस्ताक्षर । इसमें लिखा है --जंगल और बस्ती हमेशा एक दूसरे की सुविधा का ध्यान रखेंगे ।"

मुखिया ने हस्ताक्षर कर दिये और शेर राजा ने अपना पंजे की भारी भरकम छाप लगा दी । उस दिन से आज तक न कोई उस जंगल मेँ शिकार करने जाता है और न ही पेड़ को धड़ से अलग करवाता है । सुना है वह जंगल बड़ा घना व विराट हो गया है । ऊंचे ऊंचे पत्तों से ढके पेड़ों को देख बादलों का मन चलायमान हो उठता है और वे इतना बरसते हैं –इतना बरसते हैं कि जंगल मेँ मंगल  हो  जाता है 
बैंगलोर


सोमवार, 3 मार्च 2014

कहानी -2


पतझड़/ सुधा भार्गव
फोटोग्राफी -सुधा भार्गव 

      कुछ साल पहले की ही तो बात है हमारे मित्र की बेटी सुलक्षणा और दामाद सौरभ अपने प्यारे से बच्चे रूबल  के साथ चार साल के लिए लंदन गए। दोनों ही डाक्टर थे। अरमान था कि बेटे को कुछ  साल तक वहीं पढ़ाएंगे। सोचते थे बाल पौधे को हरा –भरा रखने के लिए वहाँ काफी रोशनी –पानी और खाद मिलेगी।
      रूबल वहाँ बहुत खुश था। उसका चंचल मन हमेशा वहाँ सक्रिय रहता। बाजार जाता तो किताब की दुकान में शब्दों पर निगाह जमाए पन्ने पलटता रहता ,घूमने निकलता तो आगे –आगे उसकी साइकिल पीछे –पीछे उसके मम्मी–पापा । लंदन की सड़कों पर बर्फ के फुदकते गोलों को देख खुशी के मारे खुद भी उछलने लगता । समय गुजरने के साथ -साथ उसने वहाँ नर्सरी से निकलकर कक्षा 2 उत्तीर्ण भी कर ली ।
      बातूनी होने के कारण स्कूल में उसके दोस्तों की लाइन बढ़ती ही जा रही थी और साथ में जानकारी भी ।  एक दिन उसका दोस्त विलियम स्कूल की बेंच पर  आँखों से आँसू लुढ़काता उदास सा बैठा था ।
"क्या बात है विलियम ? पापा की डांट खाकर आए हो क्या ।'' 
"पापा तो हमारे साथ ही नहीं रहते पर आज मुझे उनकी बहुत याद आ रही है ।''
"कहाँ गए वे ?"
     "मम्मी –और उनमें बहुत झगड़ा होता था इसलिए दोनों में तलाक हो गया है।''
      "तलाक क्या होता है ?"मासूम रूबल ने पूछा ।
     "यह तो नहीं मालूम । पर मेरी माँ ने बताया कि तलाक के बाद वे अलग अलग रहते हैं।'' 
     "यह कैसे हो सकता है ! मेरे मम्मी –पापा तो एक दिन अलग नहीं रह सकते ।''
     "तुम बहुत तकदीर वाले हो कि दोनों के साथ रहते हो । यहाँ जितने भी मेरे दोस्त हैं वे या तों माँ के साथ रहते हैं या पापा के साथ ।''
      रूबल दुख से भर उठा । उसके लिए तो यह नई बात थी । पर धीरे –धीरे उसे यह देखने और सुनने की आदत हो गई ।
      बहुत दिनों के बाद एक बार उसके पापा को स्कूल छोडने जाना पड़ा।गेट में घुसते ही जॉन भी अपनी पापा के साथ आता नजर आया। 
     "हॅलो रूबल !तुम भी अपने पापा के साथ आते हो ।''
    "मुझे तो माँ ही छोडने आती हैं पर आज उन्हें कुछ काम था इसलिए पापा आए।"रूबल बोला। 
     "मैं  तो रोज पापा के साथ आता हूँ । माँ को तो मैंने देखा ही नहीं ।"
    रूबल खामोश रहा क्योंकि अब उसे यह सब सुनने और देखने की आदत पड़ चुकी थी। यूरोपीय समाज की छाप उसके दिमाग में अपने चिन्ह छोडने लगी थी ।    

    एक दिन अचानक माँ –बाप की अस्वस्थ्यता का समाचार मिला तो रूबल के पिता बेचैन हो उठे। बहुत कोशिश की कि किसी तरह एक हफ्ते की ही छुट्टियाँ मिल जाएँ ताकि वे भारत जाकर माँ -बाप से मिल सकें पर प्रयत्न  निष्फल रहा।  जब खुद का जाना  असंभव  लगा तो  सुलक्षणा को अपने पति से 6 माह पहले ही भारत जाने का विचार बनाना पड़ा। अपने व रूबल के लिए दो टिकट भी खरीद लिए।  जब रूबल को  पता चला कि भारत जाने का उसका टिकट खरीदा जा चुका है तो गुस्से में गरम पानी सा खौलने लगा ।

    "माँ ,किससे पूछकर आपने भारत जाने का मेरा टिकट कराया?"
सुलक्षणा को इस प्रकार के प्रश्न की आशा न थी। फिर भी अपने को सम्हालती  हँसते हुए बोली –"अरे ,तुम मेरे बिना कैसे रहोगे ?"
    "पापा तो यहीं रहेंगे !"
    "तुम्हारे पप्पू तो अस्पताल में मरीजों को देखते रहेंगे,तुम्हारी देखभाल कौन करेगा ?"
     "मैं अपनी देखभाल करना अच्छी तरह जानता हूँ ।"
"कैसे?"
     "स्कूल में हमें बताया गया है जिनके माँ पापा अलग रहते हैं या उनका तलाक हो जाए तो उन्हें अपने काम अपने आप करने चाहिए।"

      तलाक शब्द इतने छोटे बच्चे के मुंह से सुनकर सुलक्षणा का माथा भन्ना गया। फिर भी उसके  कौतूहल ने सिर उठा लिया था।
     "मैं भी तो सुनूँ---मेरा लाड़ला क्या क्या ,कैसे-कैसे  करेगा ?"
     "घर में अकेला होने पर जंक फूड ,प्रीकुक्ड फूड,फ्रीज़ फूड खाकर और दूध पीकर रह लूँगा। मेरे पास इन्टरनेट से लिए होटल के फोन नंबर भी हैं । डायल करने से वे तुरंत घर में सबवे सेंडविच ,पीज़ा पहुंचा देंगे। माँ ,नो प्रोब्लम !"
     माँ को झटका सा लगा वह अपने बच्चे को जितना बड़ा समझती थी उससे कहीं ज्यादा बड़ा हो गया उसका बेटा ।ममता की जिन सीढ़ियों पर खड़ी खुद को गर्वित महसूस करती थी उनके ढहने से वह लड़खड़ा गई।
     बुझे से स्वर में बोली –"बेटा तुम्हें मेरी याद नहीं आएगी ?"
    "आएगी मम्मा पर टी. वी. मेरा साथी जिंदाबाद!"
    "तुम बीमार हो गए तो मैं बहुत परेशान हो जाऊँगी ।"
    "अरे आप भूल गईं !आपने ही तो बताया था एक फोन नम्बर जिसे घुमाते ही एंबुलेंस दरवाजे पर आन खड़ी होगी ।"
     "लेकिन बेटा तुम्हें तो मालूम है कि पापा थक जाने के बाद चिड़चिड़े हो जाते हैं । अगर तुम्हें डांटने लगे तो तुम्हें भी दुख होगा और मुझे भी ।"
"देखो माँ! डांट तो सह लूँगा क्योंकि पैदा होने के बाद डांट खाते खाते मुझे इसकी आदत पड़ गई है पर मार सहना मेरे बसकी नहीं । मुझे स्कूल में अपनी रक्षा करना भी बताया जाता है।"
    "अपनी रक्षा !"
    "मतलब ,अपने को कैसे बचाया जाए !"
    "तुम अपनी रक्षा कैसे करोगे ? मेरे भोले बच्चे के हाथ तो बहुत छोटे छोटे हैं ।" प्यार से सुलक्षणा ने रूबल के हाथों को अपने हाथों में ले लिया।

    माँ की ममता को दुतकारते हुए रूबल ने अपना हाथ छुड़ा लिया –"अगर पापा मुझ पर हाथ उठाएंगे तो मैं पुलिस को फोन कर दूंगा। वह पापा को झट पकड़ कर ले जाएगी या उन्हें जुर्माना भरना पड़ेगा। यहाँ बच्चों को मारना अपराध है। मैं आप के साथ भारत नहीं जाऊंगा ,वहाँ मेरे चांटे लगाओगी।"
       सुलक्षणा की इस बात में दो राय नहीं थीं कि उसका बेटा कुछ ज्यादा ही सीख गया है। उसने लंदन छोडने में ही भलाई समझी। उसे एक एक दिन भारी पड़ रहा था ।
बेटे के व्यवहार से विद्रोह की बू आ रही थी लेकिन डॉक्टर होने के नाते वह यह भी जानती थी कि उसकी सोच को एक उचित मोड़ देना होगा।

      सुलक्षणा भयानक अंधड़ से गुजर रही थी। यह कैसा न्याय !गलती करने पर माँ बाप को दंडित करने की समुचित व्यवस्था है परंतु माँ बाप से जब संतान बुरा आचरण करे तो उन्हें सजा देने या समझाने का कोई विधान नहीं ।
     लंदन में सुलक्षणा की एक डाक्टर सहेली भी रहती थी जो शादी के बाद यहीं रच- बस गई थी । उसके भी एक बेटा था । लंदन की चकाचौंध व घर -बाहर के चक्कर में सुलक्षणा ऐसी फंस गई थी कि उससे मिलना ही न हो सका। मगर जाने से पहले अपनी सहपाठिन से जरूर मिलना चाहा । जिस दिन उसके यहाँ जाना हुआ उस दिन इत्तफाक से उसके बेटे दीपक का जन्मदिन था।  

     रूबल की तो वहाँ खुशी  का ठिकाना ही न था । जाते ही दीपक की  दादी ने उसकी जेबें टॉफियों से भर दी और प्यार से बोलीं –"चलो बेटे ,दीपक के पास,केक कटने वाली है । तुम्हारी सुंदर सी फोटो भी खिचेगी ।" उनके स्नेहभरे आग्रह में रूबल को सफेद बालों से घिरा अपनी दादी का चेहरा नजर आने लगा और उनके पीछे हो लिया । बड़े हर्षोल्लास से केक काटने के बाद सबसे पहले दादी ने दीपक को केक खिलाया और  उसके गाल पर अपने प्यार की छाप लगा दी ।
    तभी ख्यालों का एक बादल रूबल से टकराया –
"तेरा जन्मदिन भी तो अगले माह है । माँ के चले जाने के बाद जन्मदिन कैसे मनाएगा
? तेरे पापा तो मरीज छोडकर केक लाने से रहे ।" रूबल का मन खिन्न हो उठा ।

     कुछ ही देर में रूबल, दीपक और उसके दोस्तों से घुलमिल गया पर उसकी साँसों में रिश्तों की महक भी घुलने लगी थी।   
    "तेरी दादी तुझे बहुत प्यार करती हैं ?"रूबल ने दीपक से पूछा ।
    "हाँ !मैं भी उनके बिना नहीं रह सकता । मम्मी –पापा का गुस्सा !तौबा रे तौबा ऐसा लगता है बिजली कड़क रही है और बस मुझ पर गिरने वाली है ऐसे समय बाबा आकर मुझे झट से बचा लेते हैं । और एक बात कहूँ किसी से कहना नहीं । जब मुझे पकौड़ी-हलुआ खाना होता है तो दादी के कान में चुपके से कह देता हूँ।  बस मेरे सामने हाजिर।"
     "मुझे भी अपने दादी बाबा की याद आ रही है । जब मैं भारत में था – माँ के न होने पर दादी माँ मुझे खाना खिलातीं ,परियों की कहानी सुनातीं। ओह !बाबा तो मेरे साथ फुटबॉल खेलते थे ।"
     "तुम उनके पास चले क्यों नहीं जाते!"
     "हाँ इसी माह जाने की सोच रहा हूँ।"  रूबल अतीत के प्रेम सरोवर में दादी –बाबा के साथ डुबकियाँ लेने लगा।

      लौटते समय रूबल रास्ते भर चुप्पी साधे रहा पर घर पहुँचते ही उसने अपनी चुप्पी ऐसी तोड़ी जो धमाके से कम नहीं थी ।
    :माँ ,हमें भारत कब चलना है ?"
    "तुम –तुम तो मना कर रहे थे ।"
    "मैं भी चलूँगा । मुझे दादी-बाबा की याद आ रही है ।" उसकी आँखें छलछला आईं।

     कुछ रुक कर बोला-"उस दिन फोन आया था ,दादी को बुखार हो जाता है और बाबा चाहे जब ज़ोर –ज़ोर से खाँसने लगते हैं । दादी तो ज्यादा चल नहीं सकतीं । बाबा को ही सारा काम करना पड़ता होगा । आप भी तो यहाँ चली आईं।यहाँ तो मेरे दोस्तों के दादी बाबा  उनसे अलग रहते हैं । बूढ़े होने पर भी उन्हें बहुत काम करना पड़ता है । कल मम्मा ,आपने आइकिया (I.K.E.A)में देखा था न ,वह पतली पतली टांगों वाली बूढ़ी दादी कितनी भारी ट्रॉली खींचती हाँफ रही थी। उसकी सहायता करने वाला कोई न था । मगर मेरे दादी -बाबा तो अकेले  नहीं हैं । मैं दौड़ दौड़कर उनके काम करूंगा ।" रूबल का मन करुणा से भरा था । 
    सुलक्षणा स्तंभित थी कि एकाएक प्रेम की खेती कैसे लहलहाने लगी। इस लहराती लहर में हरिण सी कुलाचें मारता रूबल का मन अपनी जन्मभूमि की ओर उड़ चला था और  सुलक्षणा ने भी अपने अनुकूल बहती बयार में गहरी सांस ली उसको लगा जैसे पतझड़ उसके ऊपर से गुजर गया है ।
समाप्त



रविवार, 2 मार्च 2014

कहानी -1




लतिका /सुधा भार्गव




हाँ ,उसका नाम लतिका ही था । उसकी तरह न जाने इस जग में कितनी भरी पड़ी हैं जो लता बनने से पहले ही लताड़ दी जाती हैं या अपना इस्तेमाल करने के लिए खुद विवश हो उठती हैं। 

उसके साथ तो कुछ यू हुआ –तीन भाइयों वाली वह बहन थी । पिता प्रकाश की सारी उम्मीदें उसी पर टिकी थीं । बड़ा लड़का तो शादी के बाद ही घर जमाई हो गया । लतिका ने इंटर पास किया और बी ए आनर्स में दाखिला लेने की गर्मागर्मी थी । । अचानक उसके पिता को दिल का दौरा पड़ा और परलोक गमन कर गए। परिवार सूखी टहनी की तरह बिखर  गया । प्रकाश के इलाज में काफी खर्च हो गया था । बंगला बेचकर परिवार दो कमरे के फ्लैट में समा गया । लता और उसके भाई अभावों की दुनिया में रहना सीखने लगे। तीनों का पढ़ना –लिखना छूट गया। लतिका ने छोटी सी नौकरी कर ली । शाम को दो बच्चों को पढ़ाने निकलती। वह चुपचाप घर से जाती और सीधे घर लौटती।

एकाएक न जाने क्या हुआ ,उसने नौकरी छोड़ दी । अकेली कमाऊ –चार –चार का भार । अनहोनी हो गई ।
दिन के प्रकाश में फ्लैट की खिड़कियाँ -दरवाजे बंद रहते । लगता शमशान की सी मुरदनी छाई है।  आँगन में बंधी डोरी पर एक जोड़ी जनाने कपड़े और एक जोड़ी बच्चे के कपड़े सूखते नजर आते। एक जैसे रोज कपड़े ,कहीं कुछ रद्दोबदल नहीं । कुछ दिनों में कमीजें उड़ गईं। रह गए केवल निकर। जगह –जगह थेगली से सूराख बंद होते नजर आ रहे थे। लेकिन तब भी बहुत कुछ दिखाई दे जाता। देखने वाले शर्म से आँखें झुका लेते।

अंधेरा होते ही बीयावान जंगल जैसे घर में चहल –पहल होने लगती । खिड़की से हताश सूखे चेहरे झाँकते । चबूतरे पर भी परछाइयाँ रेंगतीं पर जरा सी आहट पाते ही न जाने कहाँ लुप्त हो जातीं । लतिका धीरे से दरवाजा खोलती । उसके हाथ में कुछ न कुछ होता जरूर था । खरामा –खरामा जाती –खरामा –खरामा लौट आती पर बहुत कुछ खाली लगती । घर की नई –पुरानी चीजें ,भाड़े –बर्तन दुकानदार की भेंट चढ़ रहे थे । वह अवसरवादी पाँच के तीन ही लगाता पर लतिका के मुंह पर ताला ही जड़ा होता ।

छोटा भाई गर्मी से बेहाल ,दस्तों की चपेट में आ गया । डाक्टर को दिखाना जरूरी था ।टूटी चप्पलें घिसटाती जानी पहचानी दुकान पर वह पहुँच गई । यूसुफ को बैठा देख उसे अच्छा लगा । दसवीं तक दोनों साथ –साथ पढ़े थे । दुकानदार की तरह उसका बेटा रूखा और कंजूस न था । उसने लतिका के अच्छे दिनों का स्कूली मौजभरा जीवन भी देखा था । वह उसकी दिल से मदद करना चाहता था ।
लतिका ने अपना चेहरा उठाकर यूसुफ को निहारा फिर आदतन निगाहें नीची कर लीं।  यूसुफ को बड़ा अजीब सा लगा और बोला –तुम ठीक तो हो ।
-यूसुफ मुझे  50 रुपए दे दो । ऐसा है आज मैं बेचने को कुछ ला न पाई । अगले हफ्ते यह रुपया जरूर लौटा दूँगी ।
यूसुफ से उसकी दयनीय हालत छिपी न थी।
-हाँ –हाँ अभी देता हूँ । कहकर 50 का नोट उसके हाथों में थमा दिया ।
-कुछ और चाहिए तो बताओ । उसने सहजता से कहा ।
लता जबरन अपने होठों पर हंसी लाई और वहाँ से शीघ्र गायब हो गई ।

पंद्रह दिनों के बाद न चाहते हुए भी लतिका को यूसुफ की दुकान पर आना पड़ा । दूर से  यूसुफ ने देखा –लतिका धीरे  –धीरे उसी की ओर बढ़ती चली आ रही है । आज उसने अपने बाल बड़े कायदे से बना रखे थे । बहुत दिनों बाद दो चोटियां की थीं । कपड़े भी और दिनों की अपेक्षा स्वच्छ थे । बदली रंगत देख यूसुफ अचरज में पड़े बिना न रहा ,साथ में अंजाने सुख की तरंगों में बह निकला ।
-आओ लता ,बैठो । बहुत दिनों बाद देखा । उसने उठते हुए उसका स्वागत किया । लतिका के चेहरे पर पल को गुलाब खिल पड़े । यूसुफ के आग्रह पर लतिका उसके निकट ही बड़े इतमीनान से बैठ गई । मानो उसे कुछ काम ही न हो । समझ नहीं आ रहा था कि वह कहाँ से बातें शुरू करे ।किस मुँह से कहे –उसे 100 रुपए चाहिए । पिछले 50 रुपए तो लौटाए नहीं । भाई मरण शैया पर पड़ा है । बिना पैसे के डाक्टर हाथ नहीं रखता। माँ की आँखों का सूनापन देखा नहीं जाता।  कुछ तो करना ही होगा।

यूसुफ लतिका के मानसिक द्वंद को तो न समझ पाया पर उसने गौर किया कि लतिका का पल्ला आज बार –बार कंधे से ढुलका पड़ रहा है । शायद लतिका टूट जाना चाहती थी ।
मर्यादा का उल्लंघन होता देख यूसुफ तड़प उठा ।
-लतिका होश में आओ । उसका स्वर आक्रोश से भरा था। एक क्षण को लतिका सकपकाई । उसे यूसुफ से ऐसी आशा नहीं थी। अपने हमदर्द को पाकर वह सुबक पड़ी ।अश्रुओं की बाढ़ में यूसुफ के कंधे भीग गए। बाढ़ का पानी कम हुआ। धुंधलका साफ होने लगा। लतिका लता बन कर सिमट गई लेकिन हमेशा –हमेशा के लिए यूसुफ को दिल में बसाकर। उसके इर्द –गिर्द प्यार भरे नगमे झर झर झरने लगे । उन्हीं को उसने जीने का सहारा बना लिया। अलसाई सी उठी पर धीरे –धीरे कदम बढ़ाते हुए उसी अंधकार में विलीन हो गई जहां से आई थी ।

समाप्त