मेरी कहानियाँ

मेरी कहानियाँ
आर्टिस्ट -सुधा भार्गव ,बिना आर्टिस्ट से पूछे इस चित्र का उपयोग अकानून है।

सोमवार, 13 मार्च 2017

जीवन की अविस्मरणीय घटना


प्रकाशित -प्रतिलिपि  डॉट कॉम ,8 मार्च 2017 
जाको राखे साइयाँ मार सके न कोय 

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http://hindi.pratilipi.com/read?id=5568832377716736&ret=/sudha-bhargav/jako-raakhe-saiyan-mar-sake-na-koy

बात उन दिनों की है जब मैं हॉस्टल में रहकर अलीगढ़ टीकाराम गर्ल्स कालिज में पढ़ती थी।
बी॰ए॰ प्रथम वर्ष की परीक्षाएँ समाप्त हो गई थी। मुझे पिता जी ने अनूपशहर से चचेरे भाई मिक्की को लेने भेज दिया था। उसके साथ मेरा छोटा भाई संजू भी था।दोनों ताऊ जी के ठहरे हुए थे। ताऊजी गंभीरपुरा में रहते थे और धर्मसमाज कॉलेज के वाइस प्रिन्सिपल थे।एक दिन पहले ही अनूपशहर ले जाने वाली अटैची उनके यहाँ रख आई थी।
जिस दिन कॉलेज बंद हुआ, उसके दूसरे दिन ही 11 बजे के करीब संजू और और मिक्की हॉस्टल आन पहुंचे । उसी दिन मैं अनूपशहर जाना चाहती थी। स्कूल के गेट से निकलते ही मन में विचार आया कि जाने से पहले अपनी आँखें डॉक्टर को दिखा लूँ । काफी दिनों से आंखों में दर्द हो रहा था मगर परीक्षा के कारण टालती आ रही थे। समय बहुत कम था। सो रिक्शा वाले को उल्टे हाथ की बजाय सीधे हाथ की ओर चलने का इशारा किया। मोहनलाल नेत्रालय हॉस्पिटल पर रिक्शा रुकाई। नेत्र परीक्षण कराने के लिए नंबर लिया। वहाँ एक घंटा तो लग ही गया क्योंकि तीन बार तो एट्रोपीन ही डाली होगी।उसके असर से साफ दिखाई नहीं दे रहा था।आँखें मिचमिचाती हुई वहाँ से चल दी।
विष्णुपुरी के आगे से जब हम निकले सीटी देती हुई ट्रेन की आवाज साफ सुनाई दी। समझ गए धड़ -धड़ करती ट्रेन आने वाली है और रेलवे क्रॉसिंग का गेट जरुर बंद मिलेगा। न जाने कितनी देर ट्रेन के गुजर जाने का इंतजार करना पड़े । पर आश्चर्य तभी मैंने रेलवे क्रॉसिंग पर मेनुएल गेट का पड़ा लंबा –मोटा सा डंडा ऊपर उठते देखा। दोनों ओर का रुका ट्रैफिक आधाधुंध चल दिया । उसके बाद क्या हुआ मुझे कुछ नहीं मालूम।
मुझे जब होश आया मैंने अपने को अंधेरी सी गुफा में पाया। हाथों से दायें बाएँ, ऊपर-नीचे टटोलकर देखा । दोनों तरफ रेल की पटरियों का आभास हुआ। हाथों को ऊपर किया तो लोहे के पतले पतले सींखचों से उँगलियाँ टकराईं। मेरा दिमाग बड़ी तेजी से काम करने लगा-
-अरे मैं तो रिक्शा में बैठी थी ,जरूर उसके पलटने के कारण रेल की पटरियों के बीच गिर गई हूँ और रेल मेरे ऊपर से जा रही है। अगर मैं धोबिन की तरह पैर फैलाकर पटरियों के बीच में हो जाऊं तो ट्रेन मेरे ऊपर से चली जाएगी और मैं बच जाऊँगी।मुझमें अनंत साहस का संचार होने लगा।
कुछ दिन पहले सुना था कि हमारी धोबिन रेल की पटरियों को पार कर अपनी बस्ती जा रही थी कि उसकी धोती पटरियों में उलझ गई । दूर से आती ट्रेन को देख हड़बड़ा उठी और जल्दी से पटरियों के बीच में लेट गई। ट्रेन उसके ऊपर से निकल गई और उसका बाल बांका भी नहीं हुआ।
मैं जब पटरियों के बीच में होने की कोशिश कर रही थी तो लगा कोई मुझे बाहर की तरफ खींच रहा है । वह जितना खींचता उतना ही मैं अंदर हो जाती –तभी कानों में आवाज आई-एक्सीडेंट–एक्सीडेंट ,पटरी से बाहर आओ। 
मैं सरक कर बीच से किनारे के पास आ गई । जैसे ही उसने इस बार मुझे निकालने को ज़ोर लगाया मैं खींची चली आई।बाहर आते ही निगाहें भाइयों को खोजने लगीं।
सामने ही पटरियों से बाहर ईंटों की कंकरीट पर संजू को पीठ किए खड़ा पाया। पीछे सिर से उसके खून निकल रहा था।वह मेरे घुटनों पर बैठा हुआ था। उछलकर शायद सिर के बल कंकरीट पर जा गिरा होगा। उल्टे हाथ की ओर देखा तो मुक्की धीरे -धीरे आ रहा था। दहशत की परछाईं साफ उसके चेहरे पर झलक रही थी। हम तीनों चिपट कर ऐसे गुंथ गए कि दुनिया की कोई शक्ति हमें अलग न कर सके। शब्द प्रस्फुटित हो रहे थे- संजू ठीक तो है? जीजी-- -- । मुक्की कहीं लगी तो नहीं -- -। नहीं -- -आ- प? मुझे कुछ नहीं हुआ। उन्हें देख मेरी जान में जान आई।
हममें से किसी को अपनी चोटों की परवाह न थी । संजू तो मुश्किल से पाँचवी कक्षा में पढ़ता था और सबसे ज्यादा चोट उसी को आई थी मगर आँखों में एक आँसू न था। न जाने कैसे हम इतने सहनशील बन गए थे या एक दूसरे की हिम्मत बांधने के लिए कोई ऐसे शब्द नहीं बोलना चाहता था जो दूसरे को कमजोर बनाए। अचानक मुझे अहसास हुआ मैं बड़ी बहन हूँ जो निश्चित करना है मुझे करना है।
हम जहां खड़े हुए थे वह दुर्घटना का अंतिम छोर था। वहाँ से चलने से पहले भारी भरकम इंजन पर एक भरपूर नजर डाली जो राक्षस की तरह कहता नजर आया –बच्चू बच गए।
इतने मेँ रिक्शा वाला आया-बहन जी,आप सब ठीक तो हो?
-हाँ भैया। तुमने मुझे बचा लिया।
- मैंने पहले ही देख लिया था कि गलती से गेटकीपर ने रेलवे क्रासिंग का गेट खोल दिया है ।
आती हुई ट्रेन पूरी रफ्तार पर थी। झट से रिक्शा से कूद गया। जो खून खराबा होना था वह तो पहले ही हो गया  था ।
-तुम्हारी रिक्शा कहाँ है?
- रिक्शा की कुछ न पूछो।वह तो एक धक्का में ही टुकड़ा-टुकड़ा हो गई। आप पटरियों के बीच गिरी और इंजन ठीक आपके पास आकर रुक गया। आपमें और पहियों मेँ केवल एक फुट की दूरी- - - । ऊपर वाले ने बचा लिया। । मैं ही तो आपको पटरियों से बाहर निकालने की कोशिश कर रहा था। छोटे भाई जी गिरे पड़े थे उनकू मैंने खड़ा कर दिया।
-मैं तो हेंडिल पर बैठा –बैठा न जाने कितनी दूर तक फिसलता चला गया।पर देखो मेरे कोई चोट भी नहीं आई। मिक्की  हाथ घुमा -घुमाकर दिखाने लगा। इस चमत्कार पर वह खुद ही हैरत में था।
मैं कान से सुन रही थी पर आँखें कान से ज्यादा खुली थीं। एक तरफ पड़ी अपनी कुचली चप्पलों को मैंने पैरों मेँ फंसाया। एक हाथ से संजू को पकड़ा और दूसरे हाथ से मिक्की का हाथ थामा। लोग हमारे पास भी आने लगे थे। तमाशाई बनने से पहले मैंने वहाँ से खिसक जाना ठीक समझा। 
दो रिक्शावालों ने हमें बैठाने से मना कर दिया । शायद इस डर से कि कहीं
पुलिस की पूंछताछ के चक्कर में न पड़ जाएँ। मैं भाइयों को खींचती हुई रेलवे क्रॉसिंग से बाहर आ गई। लगा जंग के मैदान से सही सलामत हम निकल आए हैं। सड़क पर एक रिक्शा मिल गया। बूढ़ा चालक बड़ा भला मानस था। वह समझ गया हम रेल दुर्घटना के शिकार है। उसने संजू को सहारा देते हुए रिक्शा में बैठाया। बड़ी आत्मीयता से पूछा –लल्ली कहाँ चलना है?
उसके मीठे बोलों में अपनेपन की बू पाकर मन में आया उसके सामने फूटफूटकर रो पड़ूँ—पर मेरे फूट पड़ने का भाई भी रोये बिना न रहते।उनको रोता मैं नहीं देख सकती थी इसलिए अपने पर काबू किए रही।
रिक्शावाले ने पूछा –कहाँ जाना है?
-जाना तो गंभीरपुरा है पर उससे पहले किसी डॉक्टर के दवाईखाने पर ले चलो। जरा भाई के पट्टी करवा लूँ। देखो न -- -इसके खून निकल रहा है।मैंने गिड़गिड़ाते हुए कहा।
अंजान डॉक्टर के पास जाना नहीं चाहती थी। न जाने क्या उल्टा-पुलता कर दे। ताऊ जी से भी नहीं पूछना चाहती थी । वे बहुत परेशान हो जाते। इतना तो मैं समझ गई थी कि चोट गंभीर नहीं है। इसलिए अपने ही दिमाग की मशीन में तेल डाल उसे चालू रखना चाहा। हठात उन डॉक्टर का नाम याद आते ही उछल पड़ी जो हॉस्टल में हमको देखने आया करते थे। मगर एक अड़चन फिर रास्ता रोक खड़ी हो गई। नाम पता होने से क्या होता है – उनके क्लीनिक का तो अता-पता ही नहीं मालूम था। तब भी मैंने धैर्य नहीं खोया। पूछते-पाछते हम आखिर उनके क्लीनिक पहुँच ही गए।
मुझे देखते ही वे चौंक पड़े। 
घुसते ही मैं बदहवास सी बोलने लगी-डॉक्टर साहब आप संजू को तो
दवा लगाकर पट्टी बांध दीजिए । मेरी और मिक्की की चोटों पर पट्टी मत बांधिएगा। उन्हें देख ताऊ जी घबरा जाएंगे और हमें पाँच बजे अनूपशहर नहीं जाने देंगे। वे नाहक परेशान होंगे।पिताजी तो खुद डॉक्टर हैं और उनके दोस्त भी। वे सब सँभाल लेंगे। मैं एक सांस मेँ सब कह गई जो मुझे कहना था।
एक मिनट को तो डॉक्टर साहब मेरे मुंह की ओर ताकते रहे। वे भी सोचते होंगे यह तूफान कहाँ से आ गया। फिर हँसते हुए बोले-बिटिया एक मिनट बैठो तो। लगता है मैंने पहले  तुम्हें  कहीं देखा है। लो पहले तुम लोग  पानी पीओ।
-हाँ –हाँ डॉक्टर साहब, मैं टीका राम गर्ल्स हॉस्टल मेँ रहती हूँ।
-ओह!अब याद आया। तुम चिंता न करो । मैं चुटकी मेँ मरहम पट्टी करता हूँ। 
उन्होने संजू का घाव साफ कर दवा -पट्टी की। मिक्की के टिंचर लगा दिया क्योंकि उसके खरोंचें ही आई थीं ।
मेरी बारी आई तो बोले –पट्टी तो तुम बंधवाओगी नहीं जबकि दोनों कोहनी मेँ घाव हैं। जो दवा लगाऊँगा उससे बहुत दर्द होगा।
-कोई बात नहीं। मैं सब सह लूँगी।
उन्होंने भूरे से पाउडर मेँ ट्यूब से कोई मरहम मिलाया और उसे लगाने लगे।इतनी जलन और दर्द हुआ कि मैंने कसकर दाँत भींच लिए। आश्चर्य !जरा भी न कराही।फीस देने लगी तो उन्होंने इंकार कर दिया और मेरे सिर पर स्नेह सिक्त हाथ रखते हुए बोले- बहुत बहादुर बेटी है।
मुसीबत का बहुत बड़ा जंगल पार कर लिया था । खुशी से जल्दी जल्दी कदम बढ़ते हुए धम से रिक्शा में बैठ गई।
रिक्शा से ताऊजी के घर पर उतरे। ताई ने दरवाजा खोला । विस्मय से ताई का मुंह खुला का खुला रह गया-अरे संजू को क्या हुआ?यहाँ से तो भला-चंगा गया था।
-कुछ नहीं –बस गिर पड़ा था। दवा लगवा दी है। मैं सकपकाती बोली।
इतने में ताऊ जी के लड़के पंकज कॉलेज से आए। बड़े उत्तेजित दीख रहे थे। 
साइकिल रखते हुए वे कहने लगे- पिताजी-- -पिताजी रेलवे क्रॉसिंग पर बड़ा भारी एक्सीडेंट हो गया है। भीड़ ही भीड़ जमा है। ट्रेन आ रही थी कि गलती से गेट खोल दिया। सबसे पहले कार चपेट मेँ आई फिर तांगे वाला का घोड़ा ही कट गया।, सुना हैं एक रिक्शा से भी टक्कर हुई।
 मुझे लगा-मानो रेडियो से कोई ताजी और अनहोनी खबर सुनाई जा रही हो।
मुझसे सत्य छिपाना भारी हो गया और बोल उठी - -हाँ,उसमें हम तीनों थे।
-तुम तीनों!एक पल को चेहरों पर मुर्दनी छा गई।
-चोट तो नहीं लगीं। ताऊ जी बेचैन थे। 
-नहीं- - नहीं। ऐसी कोई बात नहीं। हम ठीक हैं। संजू के जरूर सिर मेँ पीछे की तरफ चोट आई। खून निकल रहा था। सो मैंने रास्ते मेँ हॉस्टल के डॉक्टर से पट्टी करा दी।मैंने जबर्दस्ती बेफिक्री के अंदाज में कहा। 
अंदर ही अंदर दिल धड़ धड़ कर रहा था—कहीं ताऊ जी ने रोक लिया तो -- ?थोड़ी सी समझ थी कि चोटें तुरंत दर्द नहीं करती पर बाद में असर दिखाती हैं। इसलिए जल्दी से जल्दी पिताजी के पास पहुँच जाना चाहती थी।
-पाँच बजे की बस से तुम अनूपशहर जाने को बैठे हो। जा सकोगे?ताऊ जी के माथे पर चिंता की रेखाएँ उभर आईं।
-हाँ- हाँ। हम चले जाएंगे।भाइयो की ओर देखते हुए बोली। जिससे वे मेरा इशारा समझ जाएँ  और हाँ में हाँ मिला दें।
-कहो तो पंकज को तुम्हारे साथ भेज दूँ ?
-नहीं ताऊ जी। यहाँ बैठकर सीधे अनूपशहर बस अड्डे ही तो उतरेंगे। उनको तसल्ली देने की भरसक कोशिश की।
पंकज भाई बस अड्डे हमें छोड़ने गए। बस मेँ चढ़ने से पहले एक बार फिर उन्होंने पूछा –तुम लोग जा पाओगे वरना लौट चलो।
-मैं उत्तर में केवल हँस दी।
हमें आगे की सीट मिल गई । आराम से बैठ गए। पर मेरे मन को चैन कहाँ?जल्दी से उड़कर अम्मा-पिताजी के पास पहुँच जाना चाहती थी । संजू और मिक्की चुप से हो गए थे।न कोई बात करते थे न ही कुछ पूछते थे। दो छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी,उनकी सुरक्षा का भार मुझ पर है-इस अहसास ने चंद घंटों में मुझे उम्र से बहुत बड़ा बना दिया था।
बस चल दी । हम एक ही सीट पर तीनों बैठे थे। मैं बीच में थी और दोनों के हाथ कसकर पकड़ रखे थे। 4-5 किलो मीटर चलने के बाद हठात बस का एक पहिया पंचर हो गया। पीछे से आवाज आई –ड्राइवर साहब सँभलकर - - - सवारी भारी है। 
पीछे मुड़कर देखा ,हॉकी लिए तीन लड़के बैठे हैं। समझते देर न लगी ये धर्मसमाज या बारह सैनी कालिज के लड़के हैं। मैंने चुप ही रहना ठीक समझा। रेल दुर्घटना की खबर अब तक पूरे शहर में बिजली की तरह फैल चुकी थी।
इन लड़कों को भी भनक मिल गई होगी। बस में भी दुर्घटना की चर्चा खूब गरम थी पर हम इस तरह बैठे हुए थे मानो एकदम अंजान हों। वरना प्रश्नों की बौछार शुरू हो जाती।
अनूपशहर बस अड्डे पर पहुँचते ही रिक्शा ली। रिक्शावाला रिक्शा ठीक ही चला रहा था पर लग रहा था उसकी गति तो चींटी की सी है। दरवाजे में घुसते ही मैं ज़ोर से चिल्लाई –पिताजी -- -पिताजी-- -। पिताजी घबराते हुए ऊपर की मंजिल से नीचे उतरकर आए। संजू के पट्टी बंधे देख चौंक भी गए।बड़े यत्न से संभाली सुबकियाँ उन्हें देखते ही बिखर पड़ीं और मैं उनसे चिपट गई।
धैर्य और साहस का थामा हुआ दामन आंसुओं में भीग गया। मुझे रोता देख संजू और मिक्की की भी हिचकियाँ बंध गई।
ताई के आते ही मिक्की उनकी छ्त्रछाया में जाकर खड़ा हो गया। संजू अम्मा के आँचल में छिप गया।
-अरे बेटा क्या हुआ? तीनों रोते ही रहोगे या कुछ बोलोगे भी। अम्मा बोलीं।
-चाची, एक्सीडेंट हो गया। मिक्की ने बड़ी देर बाद अपना मौन तोड़ा। अपनी सुरक्षा के प्रति अब वह आश्वस्त था।
ताई,अम्मा बेचैन हो उठीं।
पिता जी ने बात सँभाली-अरे पहले इनके लिए ठंडी कोकोकोला मँगवाओ। शांति से बातें करेंगे।
मैं डॉक्टर साहब को बुलाने किसी को भेजता हूँ।
जब तक डॉक्टर साहब आए हमने अपनी रामकहानी सुना दी थी। डाक्टर साहब ने हमारे हाथ-पाँव हिलाकर जांच पडताल की।
 बोले -सब ठीक है। बच्चों को आराम करने दो। 
हाँ, जाते-जाते एक एक इंजेक्शन जरूर ठोक गए।
माँ-बाप के पास जाकर लगा जैसे मैं बहुत हल्की हो गई । दूसरे दिन से ही हम लोगों का सारा शरीर बहुत दुखने लगा।दिन में एक ही कमरे में चारपाई बिछा दी जाती। दो-तीन दिन तो करवट लेते ही  कराहने लगते , कभी एक दूसरे की तरफ देखकर हंसते पर दुर्घटना की चर्चा हमने एकदम नहीं की। एक बुरे स्वप्न की तरह भुलाने की कोशिश करते रहे। पर अतीत की काली परछाईं से कभी कोई बचा है। वर्षों पहले घटित इस दुर्घटना की याद अब भी मेरी रूह को कंपा देती है । 
 एक सच लेकिन मेरी झोली में आकर जरूर गिरा कि जिस पर ईश्वर का हाथ होता है उसका बाल-बांका नहीं हो सकता।

बुधवार, 8 फ़रवरी 2017


प्रतिलिपि डॉट कॉम पर प्रकाशित कहानी -2016
लिंक-
http://hindi.pratilipi.com/sudha-bhargav/kahar-ki-raat

   
राजा लाइलाज जानलेवा बीमारी पार्किंसन से पीड़ित थे। नवंबर 2010 मेँ ही डॉक्टरों ने जबाब दे दिया था। बोले-न ही देशी दवाएं काम कर रही हैं और न ही विदेशी। टेस्ट पर टेस्ट हो रहे हैं पर उसका कोई नतीजा नहीं निकल रहा। यदि आप अगली बार मनीपाल हॉस्पिटल लाए तो सीधा आई ॰सी ॰यू॰ में ले जाएंगे। मैं इसके लिए राजी न थी। बच्चों ने भी तय किया कि अस्पताल की तरह सारी सुविधाएं जुटाते हुए घर मेँ पापा की  देखरेख की जाएगी और विधाता जितना भी समय दे उसी को वरदान समझ कर पल पल साथ बिताएँगे।  
घर पर दिनोंदिन हालत बिगड़ती ही चली गई लेकिन तीन माह बच्चों को पिता का और मुझे पति का सामिप्य मिला । इसी मेँ हमने अपने को धन्य समझा।

12फरवरी 2011  की रात ने कहर ढाना शुरू कर दिया---- 
   
लगता था उसका पल पल प्राण खींच रहा है। सुबह से ही ये बहुत खींचकर सांस ले रहे थे।  सीने से आती घर्र –घर्र की आवाज,पसलियों का ऊपर -नीचे उठना ,साथ में कराहने की आवाज--- दिल में छेद करने को बहुत थी। कभी लगता ,कह रहे हैं—माँ—माँ। आँख से दो आँसू लुढ़क पड़ते।   पीड़ा का अंत या छोर नजर न आता।सुनने में अशक्त और वाणी से मूक, मुंह सफेद झागों से भरा हुआ। मैंने मुंह के पास एक छोटा सा कटोरा (बाउल) टेढ़ा करके टिका दिया।जैसे ही किटाणु रहित पट्टी के झीने कपड़े से (sterilized gauge) मुंह खोलकर उसे साफ करती ,बहुत ज्यादा सी लार झाग सहित बाउल में आन पड़ती। 
 सुबह से ही न जाने क्यों, मैंने राजा का कमरा नहीं छोड़ा । लगता था इन्हीं के पास मंडराती रहूँ ।
दोपहर उनके पास ही पलंग पर बैठ गई। सिर पर हाथ फेरती रही,आँसू पोंछती रही,सीना मलती  रही। खाना भी मैंने पलंग पर ही खाया —ऐसा तो होता न था।
डबल बैड पर आधे से ज्यादा जगह वाटर बैड ने घेर ली थी ,उसी पर ये लेटते थे। मेरे बैठने या सोने को काफी कम जगह बचती थी। पर उस दिन तो पेट  भर जाने पर तिरछी होकर मैंने राजा के तकिये पर अपना सिर टिका दिया। हल्की सी झपकी भी ले ली। उठी तो रेखा से बोली –मुझे यहीं साहब के पास चाय दे जा।
पलंग पर बैठी चुसकियाँ लेती सोच रही थी –इनको छोड़ -छोड़कर बहुत काम कर लिया । ये मेरे साथ को तरस जाते थे। अब एक पल को  अकेला या किसी पर नहीं छोडूंगी।  पछताने लगी—। पर कितनी देर से अक्ल आई। गहरी सांस लेकर रह गई। मैं अक्सर सामने पड़ी मेज कुर्सी पर बैठकर ही चाय पीना पसंद करती थी पर उस दिन तो राजा मेरी पहली पसंद थे । नवविवाहिता की तरह जहां वे ---वहाँ मैं। उनकी परछाईं बन जाना चाहती थी।

इनका मुंह से खाना बंद था। पेट में पेग ट्यूब लग गई थी। शाम को मैंने ट्यूब से सब्जियों का सूप दिया। डर था कहीं अंदर कोई कष्ट न हो--- थोड़ा -थोड़ा करके उसमें डाला। अंतिम बार तो मैंने रात को साढ़े ग्यारह बजे  तरल सूप सा दिया । खुश थी इन्होंने तो पूरा खाना खा लिया।इतना कष्ट है –खाने पीने से शक्ति मिलती रहेगी।

मालूम था राजा की हालत गंभीर है लेकिन साथ में विश्वास और आशा की डोर से भी बंधी थी कि जल्दी मुझे छोडकर नहीं जाएंगे । करीब एक दो माह तो रहेंगे ही।
विश्वास कैसे न करती!नहाते समय कल और आज खूब अच्छे से आँखें खोलीं। मेरी तरफ अपनी बड़ी -बड़ी आंखों से देखा –मैं तो निहाल हो गई । जीजू (male नर्स)इनका  स्पंज करने ,नहलाने धुलाने व मालिश करने आया करता था। वह बोला था  -आज तो ये चौकन्ने हैं और आराम से पाउडर लगवा रहे हैं।
-हाँ,आँखें खोले तो हैं।उनमें चमक भी है। लगता है हम सबको अपने आसपास देख खुश हो रहे हैं।
-हिलडुल भी रहे हैं।  
-तो क्या फिजियाथैरेपी हो सकती है?
-जरूर ,और दिनों से तो मरीज ठीक ही लग रहा है। पखाना भी हो गया है और सांस भी ठीक से ले रहे हैं।
-दो हफ्ते से फिजियाथैरेपी नहीं हो पाई है। अभी फिजियाथ्रेपिस्ट सेंथिल से बातें करती हूँ।
-हेलो सेंथिल –क्या अभी आ सकते हो?
-हाँ जी –I am just coming
मैं सोच सोच कर बहुत  खुश थी-- थैरेपी देने से ज्यादा चेतन हो जाएँगे। पिछले 5-6 दिन से बड़े निढाल से थे।
खुश होती या उदास, दिमाग रफ्तार से दौड़ता रहता।

दशहरे का महाविनाशक दिन बार बार ख्यालों में  आकर मुझे कचोटने लगा। उससे पहले शारीरिक रूप से न सही मानसिक रूप से एकदम ठीक थे। बॉकर के सहारे कुछ कदम चल तो लेते थे । डॉक्टर भी कहते थे –बड़ी  अच्छी बात है कि याददाश्त एकदम ठीक है। लगता है किसी डॉक्टर की नजर लग गई । हो सकता है मेरी ही नजर लग गई हो। दशहरे के दिन शाम के समय पूजा करने बैठे। ये पलंग पर मसनद के सहारे नए कपड़े पहने हुए थे। पास में ही मेज पर समान रख पूजा की तैयारी कर ली थी। वैसे तो यह पूजा जमीन पर बैठकर होती है पर इनके लिए यह असंभव था। बहू -बेटे और बच्चे भी थे। इनके कमजोर  चेहरे पर मुस्कराहट बड़ी भली लग रही थी। बेटे ने एक कागज पर अनाज, घी ,चीनी, सोना, चाँदी आदि के भाव लिखे । फिर मैं बोली –लिखो,पूरब का घोडा ,पश्चिम का नीर –उत्तर का ओह मैं तो इसके आगे भूल गई –अजी आप ही बताओ –आपकी याददाश्त तो बहुत तेज है।
दक्षिण का चीर –हँसते होठों से धीमी आवाज में बोले। पर—यह क्या-- हँसते ही मुंह टेढ़ा होने लगा। सारा बदन हिलने लगा विशेषकर सिर। भागे लेकर माल्या हॉस्पिटल । पूजा –वूजा सब भूल गए। उस दिन से दौरे लगातार आने लगे। बीमारी के झटके भूत की  तरह चिपक गए और होश- हवाश छीनकर ही रहे। लगता था जैसे जीते जी  आत्मा छीन ली हो।

 याददाश्त खतम होने लगी--। आँखें खोलते तो शून्य में ताकते। आवाज—ओह –केवल फुसफुसाकर रह जाते। तीन माह में 6 बार अस्पताल में भर्ती किया। टेस्ट पर टेस्ट –सारा शरीर छलनी हो गया। अंत में डॉक्टर ने कह दिया-मरीज की हालत में कोई सुधार नहीं है। विदेशी दवाएं भी काम नहीं कर रही। अगली बार आप लाए तो सीधा ICU॰ में ले जाएंगे। जो वहाँ इलाज होगा वह कमरे में नहीं हो सकता। मैं चौंक गई-जब कोई  दवा काम ही नहीं कर रही तो इलाज कैसा। मैं बची सांसें डॉक्टरों के हवाले नहीं करना चाहती थी । इसलिए निर्णय किया कि घर ले जाकर मरीज की जरूरत के अनुसार सारी सुविधाएं जुटाएँगे।सेवा करेंगे और जितना उनका साथ मिल जाए उतना अच्छा।
इस समय वे हड्डियों का ढांचा मात्र रह गए थे । पर तब भी मैं खुश --शरीर से मेरे पास है।जो कुछ हो रहा है मेरी आँखों के सामने।

छोटी बहू का एक हफ्ते पहले आपरेशन हुआ था बेटे के साथ टांके कटवाकर शाम को मेरे पास ही आ गई। वे मेरे ही एपार्टमेंट मेँ दूसरे ब्लॉक मेँ रहते हैं।अलग रहते हुए भी हम एक हैं।  परेशानियों के बीच वह तो बेचारी अपनी परेशानी भूल ही गई थी। मैं तो हमेशा इनके बारे में ही सोचती रहती थी। एक बार उससे न पूछा क्या हाल है?
बहुत थकी लग रही थी। 9 बजे तक सोनू अपने पापा के पास ही बैठा रहा। दोनों पोतियाँ अपनी नानी के पास थीं। उनकी तरफ से जरा बेफिक्री थी। सब का एक साथ जगना ठीक न समझा मैंने। बड़ी हिम्मत से कहा-तुम दोनों जाकर आराम करो,थोड़ी देर सो भी लो।जरूरत होने पर न जाने कब तुम्हें बुला बैठूँ ।

 उनके जाते ही रात का सन्नाटा मेरे भीतर भी आलती-पालती मारकर बैठ गया। अंदर ही अंदर घबराहट होने लगी। इनका कष्ट देखा नहीं जा रहा था। काश दर्द को बाँट सकती। मेरा दर्द बांटने की जरूर कोशिश की जाती रही पर क्या मेरा दुख बँट पाया?। हाँ,अपनी व्यथा कहकर हलकापन महसूस करती हूँ। कल सुबह ही तो बड़ी बहू लंदन गई है। जाने से पहले बोली भी थी –मम्मी जी ,मैं रुक जाऊं क्या ?
–न –न जाओ । ये पहले से ठीक लगते हैं । बच्चे लंदन में अकेले हैं। मैंने ही कह दिया। उसकी भी तो जुम्मेवारियाँ हैं।
बहू से पहले कुछ दिनों को मेरे पास बेटी थी।उसके आने से मुझे बड़ा सुकून मिलता। डॉक्टर है। अपने पापा के बारे मेँ चार बातें मुझे समझाकर जाती।  भाई लोग भी  बारी -बारी से अपनी बहन का दुख बांटने आ जाते थे। लगता है राजा को सबके आने का आभास था। अपने चहेतों से मिलकर खुशी का अनुभव जरूर किया होगा। 
मैंने बहू-बेटे को आराम करने भेज तो दिया पर पर एक समस्या आन खड़ी हुई :अकेली कैसे मन लगाऊँ।नींद तो मुझसे कोसों दूर थी। तभी ध्यान  आया-बड़ा बेटा लंदन में ऑफिस से आ गया होगा। स्काई पी पर बातें करके अकेलापन का बोझ हल्का कर सकती हूँ। सो लैपटॉप खोलकर बैठ गई।
बेटा बोला –माँ ,पापा की तरफ कैमरा कर दो। हम उन्हें देखेंगे और आप बातें करती रहो। लैपटॉप इनके पलंग पर रखकर उसके पास ही स्टूल पर बैठ गई --दोनों हाथों के बीच में सिर थामे—आंसुओं को  पलकों में समाए। नहीं चाहती थी कि बच्चे मेरे आँसू देखें। अपने को वश में न रखती तो बेटा भारत के लिए तुरंत चल देता। 15 दिन पहले तो देख कर वह गया ही था और उसकी पत्नी मेरे कलेजे में उमड़ती पीड़ा की धारा  को रोकने के लिए रुक गई थी।  सबका सहयोग होते हुए भी कुछ नहीं कर पाती थी, सिवाय इनको टुकुर- टुकुर देखने के । बीच -बीच में उठती,इन्हें देखती,दूसरे कमरे में जाकर पलकों में ठहरे आँसू खाली कर आती।

इनमें आया सूक्ष्म से सूक्ष्म परिवर्तन मेरी  निगाहों से न बचता । पिछले दो दिनों फिजियाथैरेपी होने से राजा की त्वचा बड़ी मुलायम लग रही थी। यह देख तो मुझे बड़ी राहत मिली कि गले का थूक –कफ काफी मात्रा में खुद ही निकल बाहर आ रहा है। और समय तो मुझे निकालना पड़ता था।
बैठे -बैठे रात के दो बज गए। इनके सीने की घरघराहट की आवाज और कराहने की आवाज धीमी पड़ने लगी थी। धीरे -धीरे ये शांत हो रहे थे। मैं समझी अब इन्हें थोड़ा आराम है।आँखें तो कई घंटों से बंद ही थीं। अब इसे मैंने गहरी नींद माना। स्काई पी बंद कर दिया और बच्चों से कहा –अब पापा की बेचैनी कम है ,मैं भी सो लूँ। सुबह 7 बजे ही पापा को पेग ट्यूब से खाना देना है।
मुझ बेवकूफ के दिमाग में यह नहीं आया कि यह शांति दूसरी तरह की शांति है ,जीवन शक्ति कम हो रही है। नेपकिन से मैंने राजा का मुंह एक बार फिर साफ किया और सोने का उपक्रम करने लगी। थकी तो थी ही सो नींद को आना पड़ा।
*
मैं अक्सर 6 बजे उठती थी।हल्की सी कसरत से दिनचर्या शुरू करती। चाय का पानी केथली में रखकर दूध में सूजी डालकर इनका आहार तैयार करने में लग जाती। ।बीच बीच में इनके पास चक्कर लगाने से अपने को न रोक पाती। इससे मुझे बड़ी शांति मिलती। वैसे भी इनके खाने को तैयार करने व खिलाने का दायित्व मेरा ही था। मैं इनको सँभालती और नौकरानी सारा घर।
यूरिन बैग खाली कर इनको कुछ खिलाती,फिर चाय की चुसकियाँ लेते हुए सारे दिन के लिए शक्ति जुटाती। मेरी तो यह जंग थी और सच पूछो तो मैं हारना नहीं चाहती थी।प्याला खाली करते ही इनके कामों में लग जाती-आँख साफ करना,गला साफ करना,बेटाडीन सोल्यूशन लगाना,पाउडर लगाना ,तकिये धूप में डालना,रात की ठंड में ओढ़ाए दो लिहाफों में से एक करना। पैर दाबकर या हाथ से मलकर रक्त संचार को ज्यादा करने की कोशिश करती।इससे इनके पैर थोड़े से सीधे हो जाते।  ये लेटे ही रहते थे। करवट दिलाने का भी ध्यान रखना पड़ता ताकि कोई जख्म न हो जाय। तब भी जख्म तो हो जाते थे। ये बोल नहीं* पाते थे ,सोच सोच कर अधमरी हो जाती-कितना दर्द हो रहा होगा। करवट दिलाते समय यदि जरा भी झटका लगता तो कष्ट से ये बुरा सा मुंह बनाते। मैं करवट दिलाने वाले पर बरस पड़ती।
अंत में बाल काढ़ती क्योंकि सुबह  उठकर इन्हें बाल काढ़ना पसंद था। उसके बाद तो जीजू (male nurse)आकर नहलाता धुलाता, मालिश आदि करता मगर वह आता 11 बजे  और फिजियांथरेपिस्ट आता 1 बजे।तब तक ये गंदे से पड़े रहे मुझे असह्य था। मैंने जीजू से काफी काम सीख लिया था।
इतना व्यस्त देख कुछ लोग सोचते मुझे बड़ा कष्ट हो रहा है। सच पूछो तो इनके काम करने में मुझे बड़ा सुख मिलता था।
                                          *

13 फरवरी की सुबह मेरी नींद साढ़े छ्ह बजे खुली। हड़बड़ाकर उठ बैठी-अरे आज तो इनके काम को देरी हो गई। अपने सब काम भुलाकर सीधे इनके सामने जाकर खड़ी हो गई। यूरिन बैग भरा नहीं था।ठीक-ठीक था। इससे मुझे बड़ा सुकून पहुंचा। हाँ,इनके मुंह के बाहरी किनारे पर चिपका थोड़ा सा सफेद झाग दिखाई दिया। मैंने उसे साफ किया और बुदबुदाई –आह!झाग आने तो बंद हो गए। गुड—गुड।
आँखें अधखुली थीं। मैंने उन्हें बंद किया। मुंह भी खुला हुआ था। अपने को रोक न सकी—यह तो हमेशा की आदत है—सोते समय अधखुले पलक और खुला मुंह रखने की। नेपकिन लेकर माथा पूछने से पहले प्यार से माथे पर मैंने हाथ फेरा। चौंक पड़ी —एँ—माथा ठंडा –न ए॰सी॰चल रहा न ठंडी हवा आ रही। हथेली छूकर देखी—ठंडी,तालुए छुए—कुछ कुछ ठंडे । फिर तो पागल की तरह शरीर छूने लगी---बाकी शरीर तो गरम है जरूर ब्लडप्रशर कम हो गया है—तलुए कपड़े से रगड़कर देखती हूँ—अभी गरम हो जाएँगे। सोना को फोन करती हूँ आ जाएगा। ओह रविवार है।मुश्किल से 7 बजे हैं वह तो सो रहा होगा।चलो थोड़ा इंतजार कर लेती हूँ। आशंकाओं के बादल घुमड़-घुमड़ मुझे भिगोने लगे।
गरदन की दूसरी तरफ कान के पीछे के जख्म देखने चाहे ताकि दवा लगा दूँ या उसके नीचे थोड़ी सी रुई गद्दी की तरह लगा दूँ  जिससे  घाव रगड़ न खाए। अचरज—जख्मों की ललाई 25%ही रह गई थी। कमाल है एक रात में ऐसा अजूबा। जैसे ही मैंने कनपटी छोड़ी गरदन नवजात शिशु की तरह लुढ़क पड़ी।मैं घबरा गई। झटपट ऊपर का लिहाफ हटाया। दोनों हाथ सीने पर थे। एक हाथ सीने से जैसे ही हटाया बेजान सा एकदम सीधा हो गया। दूसरा हटाया –उसका भी वही हाल। पैर---- इतना लचकदार!अनहोनी---। सारा कड़ापन कहाँ चला गया? हाथ-पैर तो सीधे होते ही नहीं थे। उन्हें देख माँ के गर्भ में लेते शिशु की याद आती थी। हाथ मुड़े हुए, पैर सीने से लगे।      
मुझे क्या हो गया है?बेकार परेशान  हो रही हूँ। एक बार तो पहले भी ऐसा हुआ था करीब दो हफ्ते पहले। हाथों में ढीलापन लगा तो छटपटा गई और बाहर से बड़े बेटे और बेटी को बुला लिया। नाहक उन्हें परेशान किया। दो तीन दिन बाद तो हाथ पहले की तरह कड़े हो गए थे। --इस बार भी  शरीर का यह ढीलापन  ठीक हो जाएगा। अपने को खुद ही सांत्वना देने लगी।

कुछ ही देर में मुझे आभास हुआ –कमरे में बड़ी शांति हैं। चारों तरफ निगाह दौड़ाई । अरे –ये तो एकदम नहीं कराह रहे हैं। ज़ोर -ज़ोर से खींचकर सांस भी लेना बंद हो गया है। शायद सांस ठीक से लेने लगे है मगर अचानक –कैसे हो गया?
नाक के आगे हथेली रखी—सांस तो नहीं फेंक रहे! सीने पर कान लगाए –धड़कन ---? बार बार कान लगाने लगी --कुछ समझ में नहीं आया । हाथ की नब्ज  भी टटोली पर कुछ समझ न सकी। मेरा धैर्य चुक रहा था। अजीब सी दहशत से भर उठी—अपने जीवन साथी को खोने की दहशत जिसने साथ -साथ मरने-जीने की कसमें खाई थीं। जो मुझे छोड़कर जाना चाहता था।
काँपते हाथों से छोटी बहू को फोन मिलाया। एक सांस में कह गई-
-पापा जी के हाथ-पैर ढीले हो गए हैं,नाक से सांस नहीं चल रही है। जल्दी आकर ब्लडप्रेशर लो। सोना से बोलो-तुरंत आई ॰सी ॰यू ॰वाले डॉक्टर को जो इसी अपार्टमेंट में रहते हैं,लेकर आए। देरी न करे।
मेरे दिमाग में जो -जो आ रहा था एक क्षण की भी प्रतीक्षा किए बिना कहती जा रही थी। माथा तो ठनक ही गया था कि दाल में कुछ काला है।

सुना था प्राण निकलने के बाद शरीर में हवा भरने का डर रहता है इसलिए नाक-कान में रुई लगाना जरूरी है। मैंने इनके कान में तो रुई लगा दी पर नाक में आप जान कर नहीं लगाई। संदेह के घेरे में भटकती मेरी बुद्धि बोली- तेरा  बहम ही हो शायद कि सांस नहीं ले रहे हैं। नाक में रुई लगाने से तो दम ही घुट जाएगा।
मैंने कल ही तो फिजियाथैरेपिस्ट से पूछा था-सेंथिल,यदि किसी दिन वक्त-बेवक्त मुझे जरूरत आन पड़ी तो तुम आओगे क्या?
-मैडम जरूर आऊँगा।
उसके एक वाक्य में अपनत्व की महक पा जी उठी।
होनी ऐसी हुई कि अगली सुबह सबसे पहले मैंने  उसे ही फोन खटखटाया। बहू -बेटे के आने से पहले ही वह आन पहुंचा, उसने मेरे विश्वास का मान रखा। वह कम उम्र का बड़ा काबिल और रहमदिल डॉक्टर है।
उसको देखते ही मैं विचलित हो उठी-सेंथिल,देखो तो अंकल कैसे हैं?तुम इनका ब्लड प्रेशर लो।
उसने लिया पर चुप। कमरे से बाहर जाकर मेरे बेटे का इंतजार करने लगा।
बहू भी आई। ब्लडप्रेशर लिया।
-कितना है शिल्पा ?
-ब्लडप्रेशर यंत्र काम नहीं कर रहा है ।
-क्या हो गया?दोनों को पता नहीं लग पा रहा है। सोनू बड़ी देर लगा रहा है। डॉक्टर आकर ही कुछ बताएगा। शरीर तो इनका गरम है,मुंह भी खुला है—वह तो इनकी आदत है। पलकें तो मैंने बंद कर दी हैं। बोलती जा रही थी।

डॉक्टर साहब आए।मैं राजा के पास से हटकर दूसरी तरफ जाकर खड़ी हो गई। उनसे मैंने क्या कहा –पता नहीं मगर दूसरे ही क्षण कमरे से बाहर हो गई। वे क्या कहने जा रहे हैं,सुनने की शक्ति नहीं थी न ही बच्चों का सामना कर सकती थी। कुछ भी कहूँ पर कान तो अंदर ही लगे थे। सुना- He is no more
मेरा वह मजबूत पेड़ जड़ से उखड़कर धराशाई हो गया था जिसकी  छाया में कभी मुझे ठंडी –ठंडी हवा के झोंकों में जीवन का अनंत सुख मिला। मैं बिखर गई और बिखर गया मेरा घर संसार।
सोना ने बताया –डॉक्टर साहब के आने से कुछ देर पहले ही प्राण निकले हैं।
- बेटा,डॉक्टर साहब से मृत्यु प्रमाण पत्र ले लेना।अपने को सँभालते हुए  क्षीण स्वर में बोली।
उस सुबह की बेला में शायद  राजा मेरे उठने का इंतजार ही कर रहे थे तभी तो आँखें अधखुली थीं। मुझे जरूर देख लिया होगा। इस दुख की घड़ी में भी सुखद अनुभूति से भर उठी।

सोना के दोस्त बहुत मिलनसार और एक दूसरे के काम आने वाले हैं। उसने अपने दोस्त बुला लिए। भागदौड़ शुरू हो गई।
आठ बजते -बजते जीजू रोजाना की तरह इनको नहलाने –धुलाने आ गया।उसे क्या मालूम था –पंछी उड़ चुका है। उसने डायपर निकालकर फेंका व सफाई की। दोनों पैर बांधे ,हाथ बांधे। कैथेट्रल ट्यूब हटाई ,पैगट्यूब की जगह पट्टी बांधी। उसे निकाला नहीं गया।पत्थर की तरह खड़ी सब देखती रही। मैंने इनको लिहाफ अच्छी तरह ओढा दिया ताकि इस आपत्तिजनक हालत में इनको कोई देख न पाए।
कुछ समय तो हम फूट फूटकर रोए फिर जबर्दस्त आंसुओं को रोकने की चेष्टा में लग गए ताकि आगे सोचें।

बहू-बेटे व इनके दोस्त अंतिम क्रिया की तैयारी मेँ जुट गए। लेकिन मैं ---एक मिनट को भी इनके पास से नहीं हिली। मन की उलझने मुझे अपनी लपेट में लेने लगीं-शायद डॉक्टर ने ठीक से न देखा हो?शायद कोई चमत्कार ही हो जाए और इनकी साँसे चलने लगें। शरीर तो अभी गरम हैं। लिहाफ और अच्छे से लपेट देती हूँ ,इससे गर्मी और ज्यादा बनी रहेगी।
बार बार इनका शरीर छूकर देखती-ठंडक बढ़ी तो नहीं---लेकिन बढ़ी --। कनपटी की ठंडक
माथे पर छा गई।फिर नाक का ऊपर का कोण ठंडा होने लगा—फिर –फिर ठोड़ी की नोक । मैंने खुले मुंह को फिर बंद करने की कोशिश की मगर बंद न हुआ—अरे अभी तो जीवन है –वरना मुंह तो बंद हो जाता। मन ही मन बोली। मौत का साया तो बढ़ता ही जा रहा था। हाथों की उँगलियों से शुरू हुई ठंडक आगे बढ्ने लगी। पैरों की उँगलियों और तालुए की ठंडक भी ऊपर चढ़ने लगी।
ठंडक धीरे धीरे बढ़ रही थी। मैं अहमक़ सी हिसाब लगा रही थी -दो घंटे हाथ-पैरों की ठंडक मेँ लग गए तो बाकी शरीर ठंडा होने में 2-3 घंटे तो जरूर लगेंगे। सब तो इधर –उधर कामों मेँ लगे हैं इनके सामीप्य ये घंटे तो नितांत मेरे हैं। तब तक पेट-सीना और कमर गरम थे।

ऐसे कठिन समय में मेरी जिज्ञासा ने आंसुओं को थोड़े समय को पी लिया। जिज्ञासा थी कि प्राण कैसे निकलते हैं?चाहती थी जितने समय तक मैं इन्हें देख सकूँ देखती रहूँ। मेरे देखते- देखते मुंह की मांपेशियाँ भी लचीली हो गईं। खुला मुंह कुछ कम लगा। मैंने उसे घीरे से बंद करने की कोशिश की,बंद हो गया। पूर्ण विशवास हो गया कि प्राण निकलने की क्रिया गतिशील है। अब  आँखें नहीं खुलेंगी। नाक में भी मैंने भारी मन से रुई लगा दी। मन अस्थिर हो उठा सोच -सोचकर अब किसके कंधे पर  माथा टिका कर सुकून पाऊँगी।

अजीब सी दहशत मेरे अंग अंग में समाने लगी। किससे कहती मन के डर! तभी पास में रखी डायरी दिखाई दे गई—उँगलियों ने कलम थाम ली----
छोड़ गए मुझे । खुद भी मुक्त हो गए –मुझे भी मुक्त कर दिया। लेकिन मेरी यह मुक्ति किस काम की जिसकी कोई मंजिल नहीं।
मैंने अपने सारे आंसू तुम्हारे नाम कर दिए हैं। थोड़ी देर में तुम मुझसे छीन लिए जाओगे। तैयारी चल रही है—कानाफूसी हो रही है।
घूपबत्ती –गायत्रीमंत्र की गूंज में सब समय तुम मेरे सामने रहोगे। तुम्हारे पास ही खड़ी हूँ। ज्यादा से ज्यादा तुम्हारा रूप अपने में समा लेना चाहती हूँ।
दिल से दिल तो नहीं मिला सकती ,तुमने दिल की धड़कनें जो बंद कर ली हैं। हाँ ,तुम्हें अपने अंतर में बसा जरूर रही हूँ।
जहां जाऊँगी ---तुम मेरे साथ।
*

दरवाजे पर आहट हुई ,तंद्रा टूटी साथ ही मेरी कलम भी चलते चलते लड़खड़ा गई। सिर उठाकर देखा-सोना खड़ा है और उसके पीछे उसका दोस्त।
-माँ –पापा ---। पापा को ले जाना है। बड़ी कठिनाई से आवाज निकल रही थी।
-कहाँ---?
-ताबूत आ गया है उसमें रखे जाएंगे।
-लेकिन अभी तो शरीर गरम है।
-डॉक्टर ने कहा है –तब भी रखना होगा।
अब मैं क्या कहती। लाचार निगाहों से इनकी ओर देखने लगी । पिछले कुछ माह से जिनकी मैंने बच्चे की तरह देखभाल की उसी को छीनने कुछ हाथ आगे बढ़ते दिखाई दिए। 2-3 आदमी इन्हें उठाकर ले जाने लगे। मैंने यमदूत तो नहीं देखे पर वे जरूर मुझे यमदूत लगे। ओह! इतने कठोर—इतने हृदयहीन।
ताबूत को देखते ही मैं बिलख पड़ी-
-अरे उसमें चादर तो बिछाओ---पापा के कुछ चुभ गया तो और ये मोटी चादर ओढ़ा दो। उसके अंदर ठंड है। ये ड्राइंग रूम में जैसे ही उसके अंदर लेटे, कमरा छोड़ कर इनके सिरहाने ही बैठ गई। छू नहीं सकती थी पर देख तो सकती थी। शीशायघर में लेटे चेहरे की सुंदरता कैसे भी कम नहीं हुई थी। बंद आँखें थी पर बहुत कुछ बोलती नजर आ रही थीं। अगरबत्ती की सुगंध ,फूलों की महक और रामधुन के बीच लगता –ये अभी बोलेंगे सुधा’---। कभी लगता ,इनका बदन हिल रहा है।
सारी रात इनको ताबूत में ही रखना था ताकि रिश्तेदार और बच्चे अंतिम बार देख सकें।
जैसे जैसे रात गहराई ,मेरे अंदर का अंधेरा भी गहराने लगा और विश्वास होने लगा –अब ये शीशाई ताबूत से बाहर कभी नहीं आएंगे। तब भी घूम घूमकर इनको देखती—कैसे लग रहे हैं!कैसे हैं?मगर कब तक---।

आत्मा परमात्मा में विलीन हो चुकी थी । पार्थिव शरीर मिट्टी में मिलने वाला था। हर तरह से मेरा प्रिय मुझसे छीन लिया गया था। सुबह सजी सजाई अर्थी के साथ मैं लुटी-लुटी सी कुछ दूरी  तक छोड़ने गई—अलविदा जो कहना था। उससे आगे जाने की शक्ति नहीं रही।
जिस समय मेरा जीवन साथी पार्किंसन जैसी भयानक बीमारी से जूझते अशक्त हो रहा था उस समय भगवान मेरी परीक्षा ले रहा था। उस समय मेरे बच्चे मेरी शक्ति बन कर उभरे। पूरे परिवार ने तन -मन -धन से हर चुनौती को स्वीकार किया और उनका कष्टों को दूर करने,उनके  चेहरे पर मुस्कान के फूल खिलाने का भरसक प्रयत्न किया।कभी सफलता मिली तो कभी असफलता पर अंतिम पल तक हम अपने से नहीं हारे ---भगवान से हार गए। शायद नियति यही है।

समाप्त   

7-दर्दनाक घटना

वह चाँद सा मुखड़ा
हस्तलिखित पत्रिका में प्रकाशित 
कभी -कभी जीवन में ऐसा घटित होता है जो भूलते भी नहीं बनता और याद करते भी नहीं । जिसकी स्मृति  खरोंच दिल को लहूलुहान कर देती है । 

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 अनेक वर्षों पहले मेरे भाई  के आँगन में दो पुत्रियों के बाद पुत्र का जन्म लेना किसी समारोह से कम न था … पहली वर्षगाँठ  पर उस चाँद से  टुकड़े पर  अंजुली भर -भर आशीष लुटाया पर वह कम पड़  गया । 
रात का भोजन  मिलकर करना परिवार  का नियम था । भोजन समाप्ति पर मेरी भाभी  नन्हें नकुल को कुर्सी से उतारती और हाथ मुँह धुलाने वाश वेसिन पर ले जाती कभी स्टूल पर खड़ा करके कुल्ले कराती कभी गोदी में लेकर हाथ धुलवाती क्योंकि उसके नन्हें  हाथ वाश वेसिन तक न पहुँच पाते । वह स्टूल पास ही बाथरूम में रखा रहता ,उस पर  एक प्लास्टिक मग पानी लेने को रख देते थे । वहीं कोने में पानी से भरा प्लास्टिक का ड्रम होता  क्योंकि पानी की कमी होने से उसे भरकर रखना जरूरी था ।
एक काली रात नकुल खाने के बाद कब -कब में कुर्सी से सरककर चला गया पति - पत्नी को पता ही नहीं चला। 
काफी देर बाद होश आया --अरे नकुल कहाँ चला गया !नकुल  --नकुल आवाज लगने लगीं । उसकी बहनों ने कमरे छान मारे । माँ  ने बाथरूम ,शौचालय ,रसोई देखी ,उसके पापा छत की और दौड़े ,नौकरों ने पास पड़ोस में पूछना शुरू कर दिया --अजी आपने नकुल को तो नहीं देखा । परेशान उसके पापा बोले -घर में ही होगा ! वह बाहर जा ही नही सकता --जरूर शैतान पलंग के नीचे  छिप गया होगा या दरवाजे  के पीछे खड़ा होगा ,मैं दुबारा देखता हूँ । 
बाथरूम का दरवाजा अधखुला था और लाईट नही जली थी पर बरांडे के बल्व की रोशनी वहां पड  रही थी । भाई ने नकुल को खोजते समय जैसे ही दरवाजा पूरा खोला .उसकी चीख से घर हिल उठा। सब लोग दौड़े -दौड़े आये ...देखा --ड्रम के बीच में दो अकड़े  सीधे पैर !ड्रम में मुश्किल से दो बाल्टी  पानी होगा । उसके बीच में था पानी से भरा मग्गा ,मग्गे में फंसा हुआ था नकुल का सिर । आँख ,नाक मुँह सब  पानी में डूबे हुए थे । काफी पानी उसके शरीर में जा चुका था ।  पूरा शरीर अकड़कर सीधा खड़ा था । 
अंदाज लगाया गया -हाथ धोने नकुल बाथरूम में गया होगा । ड्रम में पानी कम होने के कारण उसने स्टूल पर खड़े होकर मग्गे से पानी झुककर लेना चाहां   ,वह इतना झुक गया कि  सर के बल ड्रम  में जा पड़ा और नियति का ऐसा भयानक खेल --सर उसका मग में फँसा । न वह हिलडुल सकता था न चीख -चिल्ला सकता था ।
 देखने वाले सदमें से बेहोश !किसी तरह उसे निकलकर पेट से पानी निकलने की कोशिश की ,कृत्रिम सांस प्रक्रिया की । मेरा भाई डाक्टर --सब कुछ समझते हुए भी समझने का साहस खो बैठा था  । कोई चमत्कार होने की आशा में चिल्लाया --किसी डाक्टर को बुलाकर तो दिखाओ और ढाढें मारकर रो उठा । डाक्टर साहब जैसे आये वैसे ही चले गए हरे- भरे घर -आँगन में वेदना की मोहर लगा कर। वर्षों तक परिवार ईश्वर के आगे सिर झुकता असाध्य कष्ट से गुजरता रहा।    
अब भी यह घटना याद आती है तो तड़पन लाती है । अंग अंग को झकझोर  देती है।  पर  उस प्यारे बच्चे के प्यारे चेहरे को भूलना वश में नहीं। 




 प्रतिलिपि डॉट कॉम में प्रकाशित  कहानी विद्रोहिणी -2016
लिंक -

http://hindi.pratilipi.com/read?id=5379593541255168&ret=/sudha-bhargav/vidrohini



विद्रोहिणी




















पोस्टकार्ड हाथ में आते ही मैं झल्ला उठी –श्रुति तूने 80 वर्ष पार कर लिए मगर गुल खिलाने से बाज नहीं आती ।
 अपने पर भरसक काबू करते हुए मैंने पढ़ा - 

हमारी पूज्य माता जी श्रुति देवी जीते जी अपना मरण दिवस मनाना चाहती हैं । इसलिए शीघ्र ही ठीक  समय पर पहुँचकर शोक सभा में सम्मिलित होने का कष्ट कीजिये ।
आपकी उपस्थिति अनिवार्य है ।
विनीत
सुपुत्र गंगा राम

-वाह रे गंगा राम !जीते जी माँ  को गंगा में बहा दिया । मगर सुपुत्र भी क्या करे !दुनिया को अपने इशारों  पर चलाने वाली के आगे अच्छे-अच्छे पानी भरने लगते हैं फिर उसकी तो बिसात क्या ! कहने को तो वह मेरी एकमात्र अंतरंग सहेली है पर कब क्या उसके दिमाग में चल जाए मैं तो क्या भगवान भी नहीं बता सकता। मैं बड़बड़ाने लगी--

आज 21 तो हो ही गई ,25 अक्तूबर को शोक सभा का दिन नियत है । कैसा शोकदिवस ,केवल कुराफाती बातें । जाना तो है ही । पूना से दिल्ली का रास्ता है भी बड़ा लंबा –सोचते –सोचते अटैची में कपड़े लगाने बैठ गई । बहू ने 23अक्तूबर का टिकट मेरे हाथों में थमा दिया । वह भी मेरी इस सखी से परिचित थी। उसकी दृष्टि से तो वह पुरानी ,सदी –गली परम्पराओं  को तोड़ने वाली एक निडर व साहसी महिला है ।

अकेला सफर ,ट्रेन दनदनाती अपने गंतव्य स्थान की ओर बढ़ रही थी । पर मैं इस सबसे  बेखबर बहुत दूर एक ऐसी विद्रोह भरी दुनिया में जा चुकी थी जो श्रुति की निडरता और साहस भरे  कारनामों से भरी पड़ी थी। ।
श्रुति के  घर में लड़कियों का अकाल था । सो उसकी परवरिश लड़कों की तरह हुई ।अपने को उनसे किसी कीमत पर कम समझने को तैयार न थी । दूसरे क्या कहेंगे ?यह सोचना तो उसके लिए टेढ़ी खीर थी।
वह अक्सर दुमंजिले पर बने कमरे की खिड़की से बाहर का नजारा देखा करती थी । कई दिन से हमारे कालिज के शहजादे उधर के चक्कर लगा रहे थे । एक दिन एक शहजादे ने अपनी सोने की अंगूठी कागज में लपेटकर खिड़की के अंदर फेंकने की कोशिश की और उसे सफलता भी मिल गई। वह यह सोच सोचकर दीवाना हुआ जा रहा था कि अंगूठी श्रुति को जरूर मिल गई होगी और जबाब आता ही होगा।  पर अंगूठी श्रुति को  नहीं मिली। हाँ, वह एक अंगूठी अपनी माँ की अवश्य पहने रहा करती थी। कालिज में आते –जाते मूर्ख शहजादा समझ बैठा कि वह अंगूठी उसी की है । वह कॉलेज में उसे एक पुर्जा थमाकर चला गया । 
लिखा था –
प्रिय,
तुमने अंगूठी कबूल कर ली पर उत्तर नहीं दिया । उत्तर में मुझे भी तुम्हारी अंगूठी चाहिए ।
कमल
श्रुति गुस्से से थरथर काँपने लगी और बोली अब चखाऊंगी बच्चू को मजा ।

घर पहुंचते ही अपने पिता को वह कागज का टुकड़ा थमा दिया और बोली –प्रिंसपल के लड़के ने मुझे यह कागज दिया है और समझता है कि मैंने उसकी दी हुई अंगूठी पहन रखी है । देखिए यह रही अंगूठी । यह तो अम्मा की है । न जाने कब  से इसे पहने हुई हूँ । बस आप इस कागज को लेकर तुरंत प्रिंसपल साहब के पास जाइए। उनका लड़का अपने को समझता क्या है !
उसके पिता श्री अपनी बेटी का विश्वास करते थे तभी तो जमाने के देखते हुए काफी छूट दे रखी थी । चाहे किसी दोस्त के जाएँ या ऑफिस में बैठें उसे अपने साथ रखना चाहते थे ताकि सबसे मिलना जुलना सीखे ।
शाम होते ही उसके पिता जी प्रिंसपल साहब से मिलने चल दिये।
दूसरे दिन श्रुति हँस –हँसकर मुझे बता रही थी –आ गई अक्ल ठिकाने। जैसे ही पिताजी ने प्रिन्सिपल साहब को खत दिया ,उन्होंने एक मिनट तो उसे पढ़ा –फिर तो ---फिर तो शर्म से गड़ गए । बोले –शर्मा जी मैं अपने बेटे की तरफ से माफी मांगता हूँ ।
-बच्चों से कभी –कभी गलतियाँ हो ही जाती हैं , बस आप उसे समझा दीजिएगा । पिता जी ने बड़ी सरलता से कह दिया । उन्हें एक दो बातें तो शहजादे को सुना देनी चाहिए थीं इतना तो हक बनता था न मंगला ।

मुझे तो उसकी बातें याद करके हंसी ही आ रही है । उसका वश चलता तो डंडा लेकर प्रिंसपाल के बेटे कमल के पीछे दौड़ पड़ती । लेकिन एक तरह से उसने ठीक ही किया । गलतफहमियाँ दूर हो गईं वरना उसी को उनका शिकार बनना पड़ता ।
मेरी स्मृतियों की खिड़की बंद होने का नाम ही नहीं ले रही थी । बालसखी के शरारत भरे अंदाज से आँखों के कोर मुस्करा उठे । यह उन दिनों की बात है जब वह आगरे पढ़ने चली गई थी और मेरे पिता जी का ट्रांसफर नैनीताल हो गया था।  उसके यहाँ पोस्ट आफिस से डाक लाने का काम एक  व्यक्ति के सुपुर्द रहता था । एक बार वह छुट्टियों में आगरे से घर गई । सुबह  के समय पिता के  पास बैठी चिट्ठियों का इंतजार कर रही थी ताकि हिन्दी पत्रों के मामले में अपने पिता की सहायता कर सके। उन्हें पढ़कर सुना सके।अंकल को उर्दू और अँग्रेजी तो खूब आती थी पर हिन्दी में कच्चे थे। एक कर्मचारी ने डाक लेकर प्रवेश किया। मेज तक आते –आते उसने श्रुति को देख 3-4 बार एक आँख खोली –बंद की – खोली –बंद की । भला श्रुति कैसे सहन कर पाती यह बदतमीजी । जैसे ही उस कर्मचारी ने डाक उसके पिताजी के हाथों थमाई ,वह उस की तरफ इशारा करते हुए बोली –
-पिताजी क्या ये नए हैं ?
-हाँ बेटा ।
-इनकी आँख में कोई बीमारी है क्या ?
-क्यों ?
-दरवाजे में घुसने के बाद ये अपनी आँख तीन- चार बार मिचमिचा चुके हैं ।
पिताजी ने त्यौरियाँ चढ़ाते ऊपर की ओर देखा।
-नहीं बाबूजी ,कोई बात नहीं है ।
बेचारा भागा दुम दबाकर ।

उसके पेट में भला यह बात कैसे पचती। दूसरे दिन ही  सारा वाक्या लिखकर श्रुति ने मुझे भेजा। मैं उसके इसी मसखरेपन पर तो मरती थी । एक बात मैं अच्छी तरह समझ गई थी मेरी सहेली पुरुषों के कुत्सित विचारों की बाढ़ को रोकने में पूर्ण सक्षम है । यदि उस जैसी महिलाओं का जन्म होने लगे तो मर्दानगी और यौन शोषण द्वारा मौज मस्ती करने वालों का खात्मा हो जाए ।
उसके साहस का सिक्का तो हर जगह चलता था। । उसको जब लड़के वाले देखने आए तो उसके पिताजी ने पूछा –बेटी क्या लड़का तुम्हें पसंद है ?
उसने खटाक से उत्तर दिया –लड़के ने मुझ समेत तीन लड़कियां देखी हैं । मैं पहला लड़का देखकर ही हाँ –ना कैसे कर सकती हूँ ?
वैसे उसे लड़का पसंद था पर नहले पर दहला डालना न भूली । 

समय का चक्र बहुत तेजी से घूमता रहा । शादी के बाद हम अपनी –अपनी गृहस्थी में रम गए पर पत्रव्यवहार बंद न हुआ । संयोग ऐसा होता कि मिलते भी रहते । 25 वर्ष पहले उससे कलकत्ता मिलना हुआ था । उस समय उसकी लड़की नेशनल मेडिकल कोलिज में पढ़ रही थी और बेटा बारहवीं क्लास में।  दोनों बच्चों के कमरे अलग –अलग थे । हॉस्टल की तरह कमरे ही में जरूरत पड़ने पर खाना पहुँच जाता ताकि पढ़ाई में बाधा न हो ।
मैं कुछ देर ही बैठी थी कि श्रुति चाय बनाने को उठने लगी । मैंने उसे बैठाते हुए कहा –अरे कहाँ जा रही है ?अब तो बेटी भी बड़ी हो गई है ,वह चाय बना देगी ।
-मंगला ,उसकी बहुत  पढ़ाई है । लड़की डाक्टर ,इंजीनियर भी बने और घर का काम भी करे इससे तो वह दोहरे बोझ के दब जाएगी ।यहीं तो हम गलती कर बैठते हैं। बेटे –बेटी में अंतर समझते हैं। बेटे को प्रधानता और सुविधाएं देने से बेटी गौण समझी जाने लगती है । यही कारण है कि आगे जाकर इसकी जड़ें इतनी मजबूत हो जाती हैं कि औरत दोयम के चौराहे पर खड़ी मिलती है ।
-मेरी  बेटी तो अपने भाई के कपड़े प्रेस करती है ,जूतों पर पॉलिश करती है । पढ़ने में भी कम नहीं।  
-उस पर मेहनत तो पड़ती है । शारीरिक परिश्रम की एक सीमा होती है। वह पढ़े भी  ,घर का काम भी उसके खाते में है । भाई –बहन, माँ –बाप की सेवा भी करे ताकि शादी बाद कुशल गृहिणी कहलाए।  । अरे ये सब औरत को दबाने की बातें हैं । बहन ही क्यों करे !भाई भी तो कर सकता है 
-तू ठीक कह रही है । देख न ,मैं नौकरी करते हुए सारा घर भी देखती थी । ये तो टूर पर रहते थे।  बच्चों की सारी ज़िम्मेदारी मेरी  थी । रात –रात तनाव के कारण जागती रहती । नींद की गोली लेनी पड़ती थी । इसी कारण तो कम उम्र में ही मुझे ब्लडप्रेशर हो गया ।
इतने में श्रुति  की बेटी आई । बड़े  प्रेम से बातें कीं और मिलकर अपने कमरे में चली गई । सहेली के विचारों ने हमेशा के लिए मुझपर अपनी छाप छोड़ दी ।

दूसरे दिन अहोई अष्टमी थी । उसकी बहू और पोती भी बंबई से आ गए । दो वर्ष की प्यारी सी पोती पतली सी पायल पहने रुनझुन करती घर में घूमा करती ।
-कल तो हम दोनों के साथ इसकी माँ भी अष्टमी का उपवास करेगी । अपनी  पोती पर प्यार उड़ेलते वह बोली ।
-बेटी की माँ ! वर्षों से प्रथा चली आ रही है लड़के की माँ ही उसकी मंगलकामना के लिए यह उपवास करती है और शाम को अहोई माँ की पूजा कर व्रत तोड़ती है ।
-लड़की ने ही ऐसा क्या पाप किया है कि माँ उसका सुख न चाहे । ईश्वर के दरबार में तो सब बराबर हैं।  श्रुति भड़क उठी ।
ईश्वर का दरबार तो मैंने नहीं देखा पर श्रुति के दरबार में बैठी –बैठी मेरे विचार जरूर पलटा खा रहे थे ।
अचानक रेल ने ज़ोर से सीटी दी और मैं विद्रोह की रोमांचक दुनिया से बाहर निकली पर आज भी तो मैं वही फँसने जा रही हूँ उसी हुल्लड़बाज  के घर! उसके जीतेजी उसी के मरने  का शोक मनाने।  ऐसा न कभी सुना और न देखा । पर वह जो दिखा दे वह भी कम ।
अकेला सफर ,रात के अंधकार में ट्रेन दनदनाती अपने गंतव्य स्थान की ओर बढ़ रही है । मन की दशा बड़ी विचित्र --सोचते –सोचते प्रगाढ़ निद्रा में लीन हो गई ।
*
पौ फटते ही मेरी नींद खुल गई । कुछ घंटों के बाद दिल्ली पहुँचने वाली थी । स्टेशन पर उसका बेटा लेने आया । रास्ते भर सच और झूठ की कशमकश में हम खामोश से बैठे रहे । घर में घुसते ही श्रुति ने मुझे गले लगा लिया और ज़ोर –ज़ोर से रोने लगी ।
मैं अपनी सहेली की ठिठोली समझ गई ।
-इतनी ज़ोर से रो रही है –यह नाटक काहे का ---।
-क्यों !शोक तो ऐसे ही मनाया जाता है । श्रुति हंस पड़ी पर मैं अंदर ही अंदर खीज रही थी ।
-अच्छा यह बता ,अब तूने यह क्या नई रीति शुरू कर दी ?
-मंगला ,एक रात मैंने सोचा – मेरे मरने के बाद न जाने कोई ठीक से पूजा पाठ ,दान दक्षिणा करेगा भी या नहीं । इसी तनाव को दूर करने के लिए मैंने शोक दिवस के कार्ड छपवा दिये । मैं अपने काम खुद ही निबटा दूँ तो अच्छा रहेगा । अब क्या करना है –बताती जा --वरना मुझसे शिकायत रहेगी, यह नहीं किया –वह नहीं किया।
मैं उस झांसी की रानी को आँखें फाड़े देखती रही और कर भी क्या सकती थी।
दूसरे दिन आमंत्रित लोग एकत्र हुए । घर में रामायण का पाठ व कीर्तन हुआ। ईश्वर से श्रुति को अपने चरणों में जगह देने की प्रार्थना की गई । पहले पंडितों को भोजन कराकर दान –दक्षिणा दी गई। तत्पश्चात सबको भोजन कराया । शाम को महापंडित जी का प्रवचन हुआ । उस समय श्रुति के बेटे-बेटियाँ अपने परिवार सहित आगे ही बैठे थे परंतु मध्य में श्रुति गंभीर मुद्रा में विराजमान थी । यह भी उसकी नाटक बाजी ही थी । स्कूल के जमाने की अभिनय प्रतिभा का खूब उपयोग हो रहा था ।
मित्रों ,रिशतेदारों ने उसका खूब गुणगान किया । वैसे भी विनोदी प्रकृति के कारण दूसरों का दिल जीतना उसके बाएँ हाथ का खेल है । इस तरह राजी खुशी शोक सभा समाप्त हुई। या कहो हास्य सभा समाप्त हुई।
जिसने भी सुना ,एक महिला जीते जी अपने मरने की रस्में निबाहना चाहती है दौड़ा चला आया।  उस अनोखी को देखने वालों की भीड़ लग गई। श्रुति का आदेश था मृतक भोज भंडारे से कोई भूखा न जाए । यह रस्म निभाने का यदि कोई उससे कारण पूछता तो उसके पास एक ही उत्तर रहता –न जाने ऊपर वाले का कब बुलावा आ जाए ,सो मैंने सोचा काल करै सो आज कर ,आज करै सो अब।  और फिर ----उसका  चिरपरिचित अट्ठहास  गूंजने लगता ।
ऐसा निराला संसार है विद्रोहिणी का । न जाने कब क्रांति के स्वर उभर पड़ें
समाप्त