मेरी कहानियाँ

मेरी कहानियाँ
आर्टिस्ट -सुधा भार्गव ,बिना आर्टिस्ट से पूछे इस चित्र का उपयोग अकानून है।

बुधवार, 24 जून 2020

कहानी



   सृजन की मौत
    
   सुधा भार्गव  
                                     
     बेटे ने फ्लॅट खरीदा और बड़े शौक से उसमें परिवर्तन कराने लगा।रसोई  का दरवाजा आधा लकड़ी का और आधा लोहे की जाली का बना था। वह उसे पसंद न था। मुझसे बोला --माँ,जाली की जगह मैं शीशा फिट करना चाहता हूँ। उस पर आप पेंटिंग कर दो। मैं उसका मुंह देखती रही ।कैसे कहूँ यह मेरे लिए बड़ा कठिन होगा।इतनी बड़ी ग्लास पेंटिंग!  मन की बात मन में ही दबाती दो दिनों तक साहस जुटाती रही। अभी तक 1x2फुट पेंटिग्स ही बनाई थीं। लेकिन बेटे के आग्रह से मैं बीच बीच में उत्साह से भी भर जाती । आत्मविश्वास ने सिर उठाया और संदेह की दीवार गिराते हुए अंदर से  आवाज आई –मैं अवश्य बना लूँगी। जब निर्णय ले ही लिया तो प्रारम्भ करने में क्या देरी!        यही सोचकर अगले दिन बढ़ई से 3फुट लंबा और दो फुट चौड़ा मोटा शीशा लाने के लिए कह दिया। उसका नाम विजय था। इन्टरनेट और पुस्तकों की सहायता से फूलों का डिजायन पसंद करने में लग गई। जो पसंद आया उसे चार्टपेपर पर शीशे के साइज का बड़ा किया । 3-4 दिनों की लगातार मेहनत व लगन से शीशे की पेंटिंग  तैयार हो गई। अपनी विजय की खुशी का उत्सव मैं खुद ही मनाने लगी। उसकी खूबसूरती आँखों में भर लेना चाहती। काफी देर तक  टकटकी लगाए देखती। लगता सच में उनकी महक मेरे इर्द-गिर्द हवा में घुल गई  है। दिन में इठलाती और रात में पेंटिंग के फ्रेम से झाँकते -मुस्कराते फूल मेरे सपनों में आते।
     शाम को घूमकर जब मैं घर की ओर आ रही थी एक सहेली मिल गई। बोली-क्या करती रहती हो। एक दिन सत्संग में चलो ।
  “मैं तो सत्संग करती रहती हूँ।" मेरी  आँखें मुस्कराईं।
  “कहाँ ?किसके साथ?"वह तो चौंक गई। 
   मेरे घर आकर देखो। तभी तो पता चलेगा। तुम्हें भी उस सत्संग में शामिल होकर आनंद आयेगा।मेरा इशारा अपनी पेंटिंग पर था।  
    अगले दिन  मैं घर के काम में व्यस्त थी कि करीब 12  बजे  दरवाजे में दो सज्जन घुसे-हमारे श्री मान के  अंतरंग मित्र। एक को कंप्यूटर पर कुछ काम था इसलिए मेरे स्टडी रूम चले गए। बेधड़क अपनी उँगलियाँ अक्षरों पर घुमाने लगे। मैंने सुरक्षा की दृष्टि से पेंटिंग ऊंचाई पर डाइनिंग टेबल पर रख दी  थी। ताकि कोई उससे टकरा न जाय।
     ये दोनों सज्जन कुछ  चाय नाश्ता तो जरूर करेंगे।  कुर्सी पर बैठकर गप्प-शप्प भी होगी।  यह सोचकर पेंटिंग  डाइनिंग टेबिल से उठाकर मैंने अन्य  कमरे में पलंग पर रख दी । । दूसरे मित्र साहब इतने बेतकल्लुफ थे कि वे भी  मेरे स्टडी रूम की तरफ बढ़ गए। जैसे ही सज्जन पेंटिंग वाले कमरे की ओर चले मेरी  तो  सांसें रुक गई ओर अनिष्ट होने की आशंका से ग्रसित  उनके पीछे भागी। मुझमें और उसमें मुश्किल से एक फुट का फासला रहा होगा  कि  देखते ही देखते वे  शीशे की पेंटिंग पर बैठ गए। चटक -चटक -चटाक आवाज हुई और उसकी  सांसें टूट गईं।   चटक चटक की  आवाज से लगा जैसे  मेरी हड्डियां ही तोड़ दी गई हों। 
     वे तो आँखों के होते हुए भी सूरदास निकले। । कोई बच्चा तोड़ता  तो 2-3 थप्पड़ लगा कर कुछ कड़वे बोल बोलकर अपने मन की निकाल लेती--- बच्ची होती तो रो रोकर घर भर देती। पर कुछ भी तो ऐसा नहीं हुआ।
     ईश्वर ने मेरा दर्प चूर करने के लिए क्षण भर में  अच्छे -खासे आदमी को अंधा बना दिया। चादर के नीचे डनलप का गद्दा था। ।बैठने से गद्दे का संतुलन बिगड़ गया। शीशे के टुकड़े टुकड़े हो गए। । शीशे के क्या टुकड़े हुए—मेरे टुकड़े हो गए।
    सज्जन भी तड़ की आवाज से चौंक गए । उठे तो उसके टूटने का दुख तो उन्हें भी हुआ। पर सॉरी कहकर शीघ्र ही कमरे से निकल गए और ड्राइंगरूम में जाकर बातों में  खो गए। किसी को कहते सुना –छोड़ यार –दूसरी बन जाएगी। लगा जैसे गरम गरम शीशा मेरे कानों में उड़ेल दिया हो। पीड़ा से छटपटा उठी। 
 अपने को कमरे में  बंद कर लिया और घंटों मातम मनाती रही। दर्द से कराहती रही। चटके फूलों को डबडबाई आँखों से देखती रही। न जाने कितनी बार उन्हें सहलाया जिन्हें असमय मौत मिल गई थी। मन में तो आया तोड़ने वाले का गिरहवान पकड़कर नीचे फिंक दूँ मगर क्या ऐसा कर सकती थी। जब अंदर की पीड़ा असहनीय हो गई तो मोबाइल में कह उठी-"बेटा,पेंटिंग वाला  शीशा टूट  गया। सत्तू ने मेरी ग्लास पेंटिंग तोड़ दी। इसके बाद मैं कुछ कह न सकी। हिचकियों ने मेरा गला दबोच लिया।
    मुझे लगा मेरे ज़िंदगी का शीशा ही दरक गया है और उसके टुकड़े मेरे  कलेजे में  घुस गए हैं। बड़ी सहजता से कह  दिया गया –कोई बात नहीं –दूसरी बन जाएगी। अरे जन्म देने वाले से तो पूछा होता---उसके सृजन  को मौत देते समय उस पर  क्या बीती होगी। वह सदमा बर्दाश्त हुआ नहीं कि अन्य सृष्टि की उम्मीद लग गई।
    मैंने अभी ग्लास पेंटिंग को दफनाया नहीं है। बिस्तर पर अजीज की तरह लेती हुई है। उसके टूटे टुकड़ों को इस तरह रखा है ताकि उसकी विकलांगता नजर न आए।आते-जाते उस पर भरपूर निगाह डाल लेती हूँ।खंडित होने पर  भी उसके सौंदर्य में  कोई कमी नहीं आई है। वैसे ही ,पतले पतले गुलाबी होठों की तरह नन्ही-नन्ही खिलती कलियाँ ,उन पर उड़तीं लाल,नीली,पीली बैंगनी तितलियाँ।
लेकिन पेंटिंग उठकर दीवार की शोभा तो कभी न बन पाएगी। बेजान सी कब तक लेटी रहेगी।
     संहारक और दर्शक  ---सॉरी कहकर पल्ला झाड़कर अलग हो गए। मेरे शोक ,में सम्मिलित होने वाला कोई नहीं।  अकेली शोकसभा कर न पाई। जल्दी से दूसरे फ्लैट 290 में गई । विजय को अपने साथ हुए हादसे को सुनाया तो सन्न रह गया। मेरे उदास चेहरे की ओर ताकता रहा। एक कारीगर एक कलाकार के असीमित संताप की अनुभूति कर बेचैन हो उठा। उसी को तो दरवाजे के फ्रेम  में उस जीती जागती पेंटिंग को फिट करना था। कोंट्रेक्टर कमाल बोला-"कैसे टूट गई। वह तो बहुत सुंदर लग रही थी।"उसका इतना भर कहना  मेरे तप्त हृदय को कितनी  ठंडक पहुँचा गया  बता  नहीं सकती।
    बेटे को भी मैंने अपने रंजिश क्षणों का भागीदार बनाना चाहा। । अपनी बात कहते-कहते रो पड़ी । शायद वह मेरी भावनाओं को समझ गया था। बोला-माँ,ऐसे न दुखी हो!कैसे न दुखी होऊँ ! दूसरी पेंटिंग सुमनों से भरी महकती क्यारियाँ बना लूँगी पर जो गई सो गई। वह तो नहीं जी सकती। उसका अनुकल्प कैसे हो सकती है !—यह विनाशकारी हाथ क्यों नहीं समझते। लगता है मेरा शोक कभी समाप्त न होगा।
समाप्त 
1006.7.23  
  

मंगलवार, 16 जून 2020

3-कोरोना का भ्रमित मंजर

 15.6.2020  /              
 कोरोना तुम्हारे कारण हम दलदल में फंसते जा रहे हैं --तुम जाते क्यों नहीं !
        बेचारी डिग्री 
सुधा भार्गव
      कोरोना के कारण लाखों मजदूर  बेरोजगार -बेघरबार हो  गए हैं इसमें कोई शक नहीं !पर कल  दूरदर्शन में यह देखकर चकित हो गई कि इंजीनियर ,एम.ए. और ग्रेजुएट फावड़ा संभाले मिटटी खोद रहे हैं  और कुछ शिक्षित ईंटें धो रहे हैं ।    पूछने पर बोले  -हमें लोकडाउन में कहाँ काम मिलेगा !पेट भरने के लिए सोचा जो काम मिल जाये उसे ही कर लें।  ।कानों -आँखों पर विशवास न कर सकी --- शिक्षित होने पर भी ऐसी नौबत !  पर वास्तविकता कुछ और ही थी।   डिग्री मिले उन्हें कई महीने हो गए हैं।  डिग्री तो है पर उनके पास डिग्री के अनुसार योग्यता नहीं है।  सपने बहुत ऊंचे रहे होंगे --कम पैसे की नौकरी करना अपनी तौहीन समझा होगा ।  ग्रेजुएट पास युवक में तो इतनी भी योग्यता नहीं थी कि एप्लिकेशन लिख सके।  इसी बीच कोरोना की चढ़ाई  हो गई।  गाँव किस मुंह से जाते ! घर वालों ने एक एक पाई जोड़ उन्हें पढ़ाया लिखाया होगा  पर नौ  महीने से कुछ नहीं कमाया बस घरवालों को  झूठी  तसल्ली देते रहे होंगे ।  समझ नहीं आता किसे दोष दें! युवकों को या अपनी शिक्षा प्रणाली  को।
       मेरे ख्याल से उनके शिक्षण में मानवीय मूल्यों का समावेश हो जाता तो पढाई ख तम कर  लेने के बाद  किसी बड़ी कंपनी या व्यवसाय में नौकरी करके केवल पैसा कमाने की चिंता उन्हें नहीं रहती। न ही जगह -जगह भटकते महीनों गुजार देते।   वे अपने ज्ञान को मानवता की भलाई में लगाने वाले कार्य की और बड़े जोश से  कदम बढ़ा चुके होते।  आज जब हम आत्म निर्भर भारत की बात करते हैं तो इस दृष्टि से शिक्षा के हर क्षेत्र में कौशल और ज्ञान के साथ -साथ मानवीय मूल्य परक शिक्षा का होना अनिवार्य सा  लगता है।  यही एक रास्ता है कोरोना काल  के आर्थिक संकट से जूझने का. मित्रों आपकी क्या राय है इस बारे में --!  

रविवार, 14 जून 2020

2 कोरोना के कड़वे घूँट

14.6.2020-kadve ghuunt
तुम जाते क्यों नहीं !
तुम्हारे कारण हमें कड़वे  घूँट पीने पड़ रहे हैं।  आखिर कब तक चलेगा यह सब !

सेनेटाइज्ड धार्मिक अनुष्ठान /सुधा भार्गव 

     पिछले साल दुर्भाग्यवश  छोटा  भाई हमें रोता  बिलखता छोड़ इस दुनिया से चला गया।  उस समय मेरा ऑपरेशन हुआ था सो अंतिम समय में मैं उसे देख  भी न सकी।   मन बहुत तड़पा , उसे किसी तरह समझाया- अब न सही उसकी बरसी में जरूर जाऊँगी।  मई २०२० में उसकी बरसी थी।  पर उससे पहले ही  कोरोना महामारी ने अपना विकराल रूप  दिखाना शुरू कर दिया ।लॉकडाउन के कारण टिकट कैंसिल करवाना पड़ा।  बहुत रोई बहुत रोई पर आंसुओं से क्या कोरोना पिघल जाता !जैसे -जैसे बरसी का दिन समीप आता जाता पंख कटे पंछी की तरह फड़फड़ाती। वाट्सएप पर सन्देश भेज नमन कर ही संतोष करती।
       ठीक बरसी  के दिन भतीजी ने  जूम का एक लिंक और पास वर्ल्ड भेजा।  जरा  सी कोशिश के बाद लैप टॉप की स्क्रीन पर वीडियो कॉफ्रेंसिंग शुरू हो गई।  पूरा परिवार बैठा नजर आया। ऐसा लगा कोसों दूर बैठे डिस्टेंसिंग का बहुत अच्छी तरह पालन किया जा रहा है।  चेहरे उदास --डबडबाती आँखों में एक ही प्रश्न  --यह किस तरह मिल रहे हैं !
     भाई के घर का नजारा शुरू हुआ --जगह -जगह हैण्ड सेनेटाइजर आँखें  मिचमिचाते इशारा कर रहे थे पहले हम से मिलो।स्वच्छ वस्त्र धारण किये  पंडित जी हवन कुंड के आगे बैठे मन्त्रों का उच्चारण कर भतीजे से आवश्यक रस्में करा रहे थे।  यह हर तरह से सेनेटाइज्ड धार्मिक अनुष्ठान था।   पंडितों को देने का सामान एक तरफ एकदम अलग रखा था।  रसोइयन व् घर का काम काज करने वाली  के न आने के कारण  भाभी व  भतीजा बहू घर के कामों में लगे थे। बीच बीच में भाभी कातर निगाहों से धार्मिक विधियां देखतीं  और छलकती आँखों से फिर रसोई में चली जाती।शायद उसे कोई काम याद आ जाता होगा।   बाद में केवल तीन पंडितों को खाते  देखा। आश्चर्य हुआ लॉकडाउन में ये कहाँ से चले आये।  पर वे पंडित भी  सेनेटाइज़्ड  थे जो अपने घर रोज नहीं जाते थे। रिश्तेदारों से  अलग रहते  ताकि खान-पान  और दान देने की प्रक्रिया निर्बाध गति से चलती रहे।वह अनोखा  अनुष्ठान दो घंटे चला। अंत में हम ठगे से रह गए।न मिलना जुलना न गले लगना न आशीर्वादों की खनक न सांत्वना के दो बोल।  दूर जाती संस्कृति को देखा  और देखते ही रहे --हिम्मत न हुई कि  उसे रोक   सकें ।     जैसे पिक्चर ख़तम होने पर उठ जाते हैं उसी प्रकार हम उठ गए --पर हमारी पिक्चर  ख़तम नहीं हुई  थी। मस्तिष्क के पटल पर   बार बार एक ही बात आ-जा रही थी  --क्या अब हमें ऐसे ही रहना होगा!
      यदि हम ऐसे ही रहने लगे तो एक दिन आएगा जब नई पीढ़ी  अपने दादा -दादी ,नाना-नानी से सुनेगी कि आजकल की तरह हमारे समय जूम नहीं चलता  था।पहले ऐसा होता था --ऐसा होता था तो अविश्वास से आँखें झपकाती बोलेगी -क्या सच में ऐसा भी होता था!

  14. 6. 2020




शनिवार, 13 जून 2020

ओ कोरोना ओ कोरोना


तू  न जाने कहाँ से आया ! आया तो जमकर बैठ गया।  अब यह भी जल्दी से बता दे--कब जाएगा तू। 

     यही सोचती हुई शाम को बालकनी में बैठकर नीचे झांक रही थी। बगीचे में गिनती के बच्चे नजर आ रहे थे।  २-३ युवक दौड़ लगा रहे थे. मेरा कोई बुजुर्ग साथी टहलता नजर नहीं आया।  कोरोना के कारण मेरी तरह सब घर में कैद हैं।  सुनने और देखने में यही आया है कि  कोरोना बूढ़ों को देख एकदम बाज की तरह झपट्टा मारता  है। आँखें तो नीचे ही देख  रही थीं पर दिमाग इतना चंचल कि उड़ता उड़ता २० साल पहले की दुनिया में पहुँच गया।

वह वृद्धा 

     सुबह कॉलेज जाते समय एक गली से गुजर रही हूँ । वहां  एक आलीशान तिमंजलि  इमारत है ।  उसकी दूसरी मंजिल की बालकनी में एक वृद्धा  खड़ी है जो   पैरों की शिथिलता के कारण  बाहर जाने में अशक्त है  पर दूसरों से मिलने के लिए उनसे बात करने के लिए उसमें तड़पन है । बेटा नौकरी पर जाता दिखाई दिया  और बहू घर के  कामों में व्यस्त।  सो अकेलापन उसे काटने को दौड़ पड़ा है ।  वह बालकनी से बाहर हाथ निकालकर दूसरों को बुला रही है ।
एकाएक मुझे अहसास हुआ मैं वही वृद्धा हूँ --उसी की तरह लोगों से मिलना चाहती हूँ ,बातें करना चाहती हूँ पर हूँ उससे भी ज्यादा मजबूर !  पैरों में सामर्थ्यता  होते हुए भी निडर होकर निकलने में एकदम असमर्थ। 

13. 6. 2020

मंगलवार, 11 दिसंबर 2018

साहित्य शिल्पी में प्रकाशित



भाग्य का खेल 
सुधा भार्गव 

यह कहानी कई साल पहले  साहित्यशिल्पी अंतर्जाल पत्रिका में छपी थी। जिसकी लिंक है - http://www.sahityashilpi.com/2010/01/blog-post_18.html

सुधा जी की यह कहानी बेशक हमें जाने पहचाने माहौल में ले जाती है, बड़े बूढों का -समाज से, अपनों से और कई बार अपने ही घर में उपेक्षित हो जाना हमारे लिए जाना पहचाना विषय है लेकिन सुधा जी की ये छोटी सी कहानी अपने अंत तक आते आते अचानक हमें चौंका देती है और हम अपने आप से से सवाल पूछने लगते हैं कि हम खुद जब इस मकड़जाल में फंसेंगे तो....। ये तो बहुत डरावना है। हम इस तो से बचना तो चाहते हैं लेकिन.... - सूरज प्रकाश-सम्पादन
-
     "ओ आसरे –-रामआसरे -----।''
    "ओह माँ !तुम्हारी आवाज क्या कमरे से रसोई में पहुँच सकती है?मुझे ही रामआसरे समझकर कोई काम बता दो। कुछ दिनों को यहाँ आती हूँ ताकि तुम्हारा कोई काम कर सकूँ। कुछ तो मुझे सेवा का मौका दो। ''. 
     "ओह चुन्नी ,तू न जाने क्या बक-बक कर रही है। अरे यह नौकर मेरे लिए ही रखा गया है। विक्की की सख्त हिदायत है कि वह पहले मेरा काम करे पर मेमसाहब के काम से उसे फुर्सत कहाँ?नौकर भी समझता है,मैं बेकार ,लाचार –बस एक बोझ हूँ। उसे बुला –ना --।''
      रामआसरे की जान अधर में। बेचारा डरते-डरते बोला-"मेमसाहब ने बाजार भेज दिया था,अम्मा अभी गरम रोटी लाता हूँ।''
      वह रोटी बनाने लगा और चुन्नी बड़े प्यार से माँ को रोटी खिलाने लगी। जर्जर मन से थकी माँ---अकेली न खा सकी और चुन्नी से भी खाने का आग्रह करने लगी। बिना भावज के चुन्नी को खाना अच्छा न लगा।
     बूढ़ी माँ भड़क पड़ी-"अरे तू किसके चक्कर में पड़ी है। वह तो नाश्ता करती ही नहीं। मुझे -नौकर डबल रोटी कच्ची-पक्की सेककर भुजिया के साथ दे जाता है। उपदेश तो बहुत –यह मत खाओ—पेट में दर्द हो जाएगा। भूख तो लगती है। कैसे भूखी रहूँ।''
      चुन्नी जानती थी-माँ कड़वा सत्य बोल रही है पर उन्हें शांत करने के लिए इधर उधर की बातें करने लगी। पान और तंबाखू की शौकीन माँ को उसने बीड़ा लगाकर दे दिया। माँ की आँखों में आँसू आ गए। उसका हाथ पकड़ते हुए बोली –"बेटा ,तू तो दो दिन बाद चली जाएगी फिर तो मुझे अकेले ही इस कमरे में ज़िंदगी काटनी होगी। नूतन अपने कमरे में रहती है। कमरा क्या है महल है। फ्रिज ,टी वी सभी तो है। बच्चे वही खाते-खाते टी वी देखते, खाली समय में कंप्यूटर चलाते हैं। खुद भी न जाने क्या क्या जूस फ्रिज से निकालकर पीती रहती है। मेरे लिए सेब नहीं खरीदे जाते।कहो तो सुनने को मिलता है –यहाँ तो मिलते नहीं हैं,शहर में मिलते है। अच्छा ला-- फोन मिला—हेलो –आभा,तुमने तो फोन ही नहीं किया। अच्छा शाम को आओ तो दो किलो सेब लेती आना।''
     माँ अपनी बड़ी बहू को फोन करके सो गई। चुन्नी को भी भूख लगने लगी थी। वह रसोईघर में गई,जो कुछ मिला उससे पेट भर लिया। तभी कमरे  का दरवाजा खुला और उसने छोटी भाभी की आवाज सुनी-"जीजी ,आपने खाना खा लिया क्या?"
    "हाँ,बहुत इंतजार किया। तीन बज गए तो सोचा—खा लूँ।"
     नूतन बड़े इत्मिनान से खाने बैठ गई। चुन्नी उसकी ओर देखती रह गई फिर सोचकर उठ गई –"अपने ही तो हैं,यह तो मुझसे बहुत छोटी है ----समय से सब समझ आ जाएगी।"
     माँ से उसने इस बारे में कोई बात नहीं की। उन्हें बताने का मतलब था –उन्हें दुखी करना। उनका समय तो पिता जी की मृत्यु के बाद ही जा चुका था। एक विशाल साम्राज्य की मलिका होते हुए भी विरक्तिवश जीते जी उसे अपने बहू-बेटों को सौंप दिया जिसका परिणाम ही वे भोग रही थीं।

      दिन छिपते ही बड़ी बहू आभा और बेटा फल लेकर हाजिर हो गए। आभा की यह तारीफ थी कि सास के जबान हिलाते ही उनकी हर इच्छा पूरी करती थी। माँ ने भी अबकी बार बड़े बेटे के पास जाना चाहा परंतु वहाँ पहले से ही उसके ससुरालिया पौड़ लगाए थे, वे जाती कहाँ ? कहने को तो इस कमरे में हर तरह का आराम था –सजा सजाया कमरा ,फोन ,फ्रिज,फर्नीचर,झोलीभर पैसा। पर क्या वे सुखी थीं!
    उस आधी रात अम्मा को भूख लगी। चुन्नी सेब  काटकर उन्हें देने लगी। पूछा-"माँ कैसी हो?"
    "बेटा,मैं लालकिले के तहखाने में बंद वह शाहजहाँ हूं जिसकी मिल्कियत छीन ली गई है और तुम्हारी भाभी उस पर और उसके राज्य पर शासन करना चाहती है। भाग्य के इस खेल में मैं हार चुकी हूँ।"
      "सुनकर चुन्नी सन्नाटे में आ गई।रोम-रोम एक अज्ञात आशंका से काँप उठा। माँ को 4-5 दवाएं दीं जिनकी वे आदी हो चुकी थीं। सबसे उनका जी भर चुका था पर दवाओं से नहीं। माँ डायजापाम लेकर खर्राटें भरने लगीं। चुन्नी उन्हीं के पास लेट गई। उनकी कमर में हाथ डालकर बुदबुदा उठी-"माँ, मैं तुम्हें बहुत प्यार करती हूँ। मुझे तुम्हारे प्यार की जरूरत है। इस तरह नींद की गोली लेकर मुझे न भूली।" जबकि वह जानती थी माँ सारे दुखों से छुटकारा पाने के लिए अपने को भूलने की कोशिश में है।
     चुन्नी के पोर-पोर में टीस उठने लगी। काश!वह कुछ दिन माँ को अपने पास रख पाती! मगर रखती कैसे?वह तो एक पल को भी बेटों की नगरी से जुदा नहीं होना चाहती थी। सब समय तो उनकी आँखों में रहती है क्षमा और हृदय में लहराता है वात्सल्य का समुंदर। बड़े संकोच के साथ बेटी के यहाँ कुल मिलाकर दो माह रही होगी वह भी टुकड़ों-टुकड़ों में। कहती थी-"कन्यादान के बाद बेटी के घर का निवाला गले में अटक जाता है।" क्या एक वृदधा की मूक पीड़ा ,असम्मान की ज़िंदगी—इनकी चर्चा भाई के सामने करे। नहीं—नहीं --। उसने तो घर के साथ- साथ माँ की बागडोर भी पत्नी के हाथों थमा दी अब तो वे उसी के रहमोकरम पर हैं।
    चुन्नी क्या करे क्या न करे। खुद ही प्रश्न करती,खुद ही जबाव दे देती। इस मकड़जाल में उसकी जान अटककर रह गई।
       उसके भी तीन बेटे है। अज्ञात भय से हिल गई। मस्तिष्क में हजारों डंक एक साथ चुभन देने लगे पर दूसरे ही क्षण आत्मघाती विचारों को परे फेंकती उठ खड़ी हुई और बुदबुदाई –मैं अपने भाग्य का सृजन स्वयं करूंगी।  



शनिवार, 25 अगस्त 2018

संस्मरण 2 :आश्चर्य

प्रकाशित
साहित्य सुधा -साहित्यकारों की वेब पत्रिका 
अंक अगस्त -2018 

http://www.sahityasudha.com/articles_aug_2nd_2018/sansamaran/sudha_bhargava/ashcharya.html.pdf



आश्चर्य पर आश्चर्य 

सुधा भार्गव

14मई ,2017

     मेरे छोटे बेटे को आश्चर्य पर आश्चर्य देने की आदत है। उसकी पत्नी भी उसका खूब साथ देती है। अचानक झोली में आन पड़ी खुशियों का भार सँभालना कभी कभी मुश्किल भी हो जाता है। पर इतना अवश्य है कि एक अरसे तक आश्चर्य के सम्मोहन से रोम -रोम पुलकायमान रहता है।  
मुझे अच्छी तरह याद हैं बेटे की शादी के बाद हम पति- पत्नी  पहली बार उससे मिलने अमेरिका गए थे। एक दिन रात को भोजन करने के बाद वह बोला-“पापा मैं अभी आता हूँ।’’वह और बहू खुसर-पुसुर करते गायब हो गए। हम सोचते ही रहे—इतनी रात गए  अचानक कहाँ जाना पड़ गया! ऑफिस से आने के बाद तो वह हमारे बिना कहीं जाता ही नहीं है ।
करीब एक घंटे के बाद दोनों लौट कर आए। चेहरे पर हर्ष की लहरें तरंगित हो रही थीं । एकाएक इतना उल्लास!  
     बेटा खनकती आवाज में बोला-“पापा,खिड़की से जरा बाहर झांक कर तो देखो।”
     “दरवाजे पर तो कार खड़ी सी लगती है।कोई आया है क्या?
     “यह मैंने आपके लिए खरीदी है। कल से खूब घूमेंगे।“
     “अरे वाह! तूने कार खरीद ली।”  वे बच्चे की तरह चहक पड़े और बेटे को गले लगा लिया ।
     कुछ वर्षों के बाद वह पूना आ गया। उन दिनों हम दिल्ली रहते थे। सर्दी के दिन थे इसलिए जल्दी खा-पीकर लिहाफ में दुबक जाते।रूम हीटर और साथ में टी॰ वी। दोनों चालू कर देते। उस रात भी टी॰ वी॰ बंद कर सोने का उपक्रम कर ही रहे थे कि दरवाजे की घंटी बज उठी ।हम दोनों ही एक बारगी तो बुरी तरह चौंक पड़े, फिर मैं बोली-“सो जाओ—सो जाओ। रात के बारह बजे हमसे मिलने कौन आयेगा?किसी ने गलती से बजा दी है।” 
एक मिनट बाद फिर घंटी बोल पड़ी। साथ ही मेरा मोबाइल भी घरघरा उठा –हेलो माँ! कैसी हो?
     “कौन,मन्नू! इतनी रात गए तेरा फोन! सब ठीक तो है। मैं अनहोनी की  आशंका से ग्रसित हो उठी।
    “हाँ माँ।’’
    “जरा मन्नू  से बात करो जी ,मैं जाकर दरवाजे पर देखती हूँ –।’’ मैं फुर्ती से कमरे से बाहर हो गई।
    ये ज़ोर से बोले –“दरवाजा न खोलना।’’
    मैं सांस रोके दरवाजे के पास खड़ी थाह लेने लगी, “कौन हो सकता है? निश्चय ही दरवाजे से बाहर कोई खड़ा है।”
    तभी दरवाजा किसी ने ज़ोर से थपथपाया। मैंने कड़ककर पूछा–“कौन है?”
    धीमी रेशम सी आवाज आई –“माँ मैं हूँ।”
    “तू मन्नू !अभी तो पूना से तेरा फोन आया था। यहाँ कैसे हो सकता है?”
    “माँ मैंने यहीं से फोन किया था। दरवाजा खोलो।”
    पीछे से दहशत भरा स्वर गूँजा ---दरवाजा न खोलो। मुझे रोकने को मेरे पति  छटपटाते मेरी  तरफ दौड़े दौड़े आए। तब तक मैं दरवाजा खोल चुकी थी। मन्नू अंदर आते ही बोला- “पापा हैपी बर्थ डे।” एक मिनट को उन्हें अपनी आँखों पर विश्वास न हुआ पर दूसरे पल ही वास्तविकता का भान हुआ तो गदगद हो बेटे को अपनी बाहों के घेरे में ले लिया।
    “बेटा आने की खबर भी न की।” प्यार भरा लहजा शिकायत से भरपूर था ।
    “ओह प्यारे पापा, आपके जन्मदिन पर अचानक आकर दोनों को चकित कर देना चाहता था।”
    “इतना बड़ा हो गया पर तेरी सरप्राइज़ देने की आदत गई नहीं। अच्छा अचानक आना कैसे हुआ?
    “आपकी बर्थडे के लिए ही आया हूँ। पापा यह रहा आपका गिफ्ट।”
   “बेटा सबसे बड़ा गिफ्ट तो यही है कि तू हमसे मिलने आ गया।” बड़ी देर तक मैं उसके हाथ को ममता से सहलाती रही।
    हाँ अब तो वह दो बच्चों का बाप हो गया है। पर वक्त - बेवक्त दूसरों को हैरानी में डालना नहीं छोड़ा है। ऐसी प्लानिंग करता है कि किसी को कानों-कान खबर हो ही नहीं पाती।
     कल ही हम गोवा से लौटकर आए हैं। दो हफ्ते पहले वह बोला था – “माँ गोवा चलोगी?”
“हाँ हाँ क्यों नहीं। बाहर गए हुए भी बहुत दिन हो गए हैं।” मैंने साधारण तौर से कह दिया।
गोवा जाने के लिए 14 मई की हवाई जहाज की टिकटें उसने बुक करा दीं।
    उस दिन बड़े सवेरे बेटी का फोन आया–“माँ, हैपी मदर्स डे। सुनते ही दिमाग को जोरदार झटका लगा और वह बड़ी तेजी से काम करने लगा। अब समझ में आया बेटे ने गोआ जाने के लिए 14 तारीख ही क्यों चुनी। अधरों पर वात्सल्य में डूबी मुस्कराहट फैल गई।
    संयोग की बात, इस ट्रिप में तीन माँ साथ साथ थीं।मैं, मेरी पोतियों की माँ और मां की माँ –मतलब मेरी समधिन जी। गोवा ट्रिप की बजाय इसे मदर्स ट्रिप कहा जाय तो ठीक रहेगा।
अब मुझे अगले आश्चर्य का इंतजार है।बेटे का  हर सरप्राइज़ मेरी  उम्र बढ़ा देता है। ऐसा लगता है जैसे ईशवर ने मेरे कंधे पर अपनी उँगलियों की छाप छोड़ दी हो।

समाप्त  


शनिवार, 25 नवंबर 2017

कविता-2


 साहित्यिकी अंतर्जाल पत्रिका में प्रकाशित 
लिंक -https://sahityikee.wordpress.com/2017/11/09/anaath-se-sanaath-sudha-bha

घर को व्यवस्थित करते हुये
मुझे मिला
पीतल का एक कटोरदान
न बन सकी उसकी कद्रदान ,
पुराने फैशन का समझकर
नाक भौं सकोड़कर
पीछे  सरका दिया था
पता न था एक दिन
यही हो जाएगा
मेरे लिए वरदान। 

बहुत देर तक
उसे थामे रहे हाथ
छोड़ने को तैयार न थे
उसका साथ  
फिसलती उँगलियाँ
ढूँढने की कोशिश में थीं
शायद माँ के हाथों की छाप
जो तोड़ गई थी रिश्ता
बिना कहे कोई बात।

अचानक पैदा हुई एक थाप  
मोहभरा संगीत भरा नाद
मोह से उपजी सिहरन
सिहरन से थी
अंग अंग में थिरकन
उसकी गूंज में मैं खो गई,
आभास हुआ
वह मेरे कंधों को छू रही है
बालों में उँगलियाँ घूमा रही है
आशीर्वाद की धूरी पर
मंत्र फुसफुसा रही है।

उसने बड़े प्यार से
अपने हाथों को बढ़ाया
लड्डुओं का कटोरदान
मुझे धीरे से थमाया  
अल्हड़ बालिका सी मुस्कुराकर
मैंने सीने से उसे लगाया ।
पलभर की छुअन में
मैं रम गई
एक बार फिर
अनाथ से सनाथ हो गई।

समाप्त