मेरी कहानियाँ

मेरी कहानियाँ
आर्टिस्ट -सुधा भार्गव ,बिना आर्टिस्ट से पूछे इस चित्र का उपयोग अकानून है।

मंगलवार, 11 दिसंबर 2018

साहित्य शिल्पी में प्रकाशित



भाग्य का खेल 
सुधा भार्गव 

यह कहानी कई साल पहले  साहित्यशिल्पी अंतर्जाल पत्रिका में छपी थी। जिसकी लिंक है - http://www.sahityashilpi.com/2010/01/blog-post_18.html

सुधा जी की यह कहानी बेशक हमें जाने पहचाने माहौल में ले जाती है, बड़े बूढों का -समाज से, अपनों से और कई बार अपने ही घर में उपेक्षित हो जाना हमारे लिए जाना पहचाना विषय है लेकिन सुधा जी की ये छोटी सी कहानी अपने अंत तक आते आते अचानक हमें चौंका देती है और हम अपने आप से से सवाल पूछने लगते हैं कि हम खुद जब इस मकड़जाल में फंसेंगे तो....। ये तो बहुत डरावना है। हम इस तो से बचना तो चाहते हैं लेकिन.... - सूरज प्रकाश-सम्पादन
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ओ आसरे –-रामआसरे -----।
-ओह माँ !तुम्हारी आवाज क्या कमरे से रसोई में पहुँच सकती है?मुझे ही रामआसरे समझकर कोई काम बता दो। कुछ दिनों को यहाँ आती हूँ ताकि तुम्हारा कोई काम कर सकूँ। कुछ तो मुझे सेवा का मौका दो।
-ओह चुन्नी ,तू न जाने क्या बक-बक कर रही है। अरे यह नौकर मेरे लिए ही रखा गया है। विक्की की सख्त हिदायत है कि वह पहले मेरा काम करे पर मेमसाहब के काम से उसे फुर्सत कहाँ?नौकर भी समझता है,मैं बेकार ,लाचार –बस एक बोझ हूँ। उसे बुला –ना --।
रामआसरे की जान अधर में। बेचारा डरते-डरते बोला-मेमसाहब ने बाजार भेज दिया था,अम्मा अभी गरम रोटी लाता हूँ।
वह रोटी बनाने लगा और चुन्नी बड़े प्यार से माँ को रोटी खिलाने लगी। जर्जर मन से थकी माँ---अकेली न खा सकी और चुन्नी से भी खाने का आग्रह करने लगी। बिना भावज के चुन्नी को खाना अच्छा न लगा।
बूढ़ी माँ भड़क पड़ी-अरे तू किसके चक्कर में पड़ी है। वह तो नाश्ता करती ही नहीं। मुझे -नौकर डबल रोटी कच्ची-पक्की सेककर भुजिया के साथ दे जाता है। उपदेश तो बहुत –यह मत खाओ—पेट में दर्द हो जाएगा। भूख तो लगती है। कैसे भूखी रहूँ।
चुन्नी जानती थी-माँ कड़वा सत्य बोल रही है पर उन्हें शांत करने के लिए इधर उधर की बातें करने लगी। पान और तंबाखू की शौकीन माँ को उसने बीड़ा लगाकर दे दिया। माँ की आँखों में आँसू आ गए। उसका हाथ पकड़ते हुए बोली –बेटा ,तू तो दो दिन बाद चली जाएगी फिर तो मुझे अकेले ही इस कमरे में ज़िंदगी काटनी होगी। नूतन अपने कमरे में रहती है। कमरा क्या है महल है। फ्रिज ,टी वी सभी तो है। बच्चे वही खाते-खाते टी वी देखते, खाली समय में कंप्यूटर चलाते हैं। खुद भी न जाने क्या क्या जूस फ्रिज से निकालकर पीती रहती है। मेरे लिए सेब नहीं खरीदे जाते।कहो तो सुनने को मिलता है –यहाँ तो मिलते नहीं हैं,शहर में मिलते है। अच्छा ला-- फोन मिला—हेलो –आभा,तुमने तो फोन ही नहीं किया। शाम को आओ तो दो किलो सेब लेती आना।
माँ अपनी बड़ी बहू को फोन करके सो गई। चुन्नी को भी भूख लगने लगी थी। वह रसोईघर में गई,जो कुछ मिला उससे पेट भर लिया। तभी कमरे  का दरवाजा खुला और उसने छोटी भाभी की आवाज सुनी-जीजी ,आपने खाना खा लिया क्या?
-हाँ,बहुत इंतजार किया। तीन बज गए तो सोचा—खा लूँ।
नूतन बड़े इत्मिनान से खाने बैठ गई। चुन्नी उसकी ओर देखती रह गई फिर सोचकर उठ गई –अपने ही तो हैं,यह तो मुझसे बहुत छोटी है –समय से सब समझ आ जाएगी।
माँ से उसने इस बारे में कोई बात नहीं की। उन्हें बताने का मतलब था –उन्हें दुखी करना। उनका समय तो पिता जी की मृत्यु के बाद ही जा चुका था। एक विशाल साम्राज्य की मलिका होते हुए भी विरक्तिवश जीते जी उसे अपने बहू-बेटों को सौंप दिया जिसका परिणाम ही वे भोग रही थीं।

दिन छिपते ही बड़ी बहू आभा और बेटा फल लेकर हाजिर हो गए। आभा की यह तारीफ थी कि सास के जबान हिलाते ही उनकी हर इच्छा पूरी करती थी। माँ ने भी अबकी बार बड़े बेटे के पास जाना चाहा परंतु वहाँ पहले से ही उसके ससुरालिया पौड़ लगाए थे, वे जाती कहाँ ? कहने को तो इस कमरे में हर तरह का आराम था –सजा सजाया कमरा ,फोन ,फ्रिज,फर्नीचर,झोलीभर पैसा। पर क्या वे सुखी थीं!
उस आधी रात अम्मा को भूख लगी। चुन्नी सेब  काटकर उन्हें देने लगी। पूछा-माँ कैसी हो?
-बेटा,मैं लालकिले के तहखाने में बंद वह शाहजहाँ हूं जिसकी मिल्कियत छीन ली गई है और तुम्हारी भाभी उस पर और उसके राज्य पर शासन करना चाहती है। भाग्य के इस खेल में मैं हार चुकी हूँ।
सुनकर चुन्नी सन्नाटे में आ गई।रोम-रोम एक अज्ञात आशंका से काँप उठा। माँ को 4-5 दवाएं दीं जिनकी वे आदी हो चुकी थीं। सबसे उनका जी भर चुका था पर दवाओं से नहीं। माँ डायजापाम लेकर खर्राटें भरने लगीं। चुन्नी उन्हीं के पास लेट गई। उनकी कमर में हाथ डालकर बुदबुदा उठी-माँ, मैं तुम्हें बहुत प्यार करती हूँ। मुझे तुम्हारे प्यार की जरूरत है। इस तरह नींद की गोली लेकर मुझे न भूली। जबकि वह जानती थी माँ सारे दुखों से छुटकारा पाने के लिए अपने को भूलने की कोशिश में है।
चुन्नी के पोर-पोर में टीस उठने लगी। काश!वह कुछ दिन माँ को अपने पास रख पाती! मगर रखती कैसे?वह तो एक पल को भी बेटों की नगरी से जुदा नहीं होना चाहती थी। सब समय तो उनकी आँखों में रहती है क्षमा और हृदय में लहराता है वात्सल्य का समुंदर। बड़े संकोच के साथ बेटी के यहाँ कुल मिलाकर दो माह रही होगी वह भी टुकड़ों-टुकड़ों में। कहती थी-कन्यादान के बाद बेटी के घर का निवाला गले में अटक जाता है। क्या एक वृदधा की मूक पीड़ा ,असम्मान की ज़िंदगी—इनकी चर्चा भाई के सामने करे। नहीं—नहीं --। उसने तो घर के साथ -। साथ माँ की बागडोर भी पत्नी के हाथों थमा दी अब तो वे उसी के रहमोकरम पर हैं।
चुन्नी क्या करे क्या न करे। खुद ही प्रश्न करती,खुद ही जबाव दे देती। इस मकड़जाल में उसकी जान अटककर रह गई।
उसके भी तीन बेटे है। अज्ञात भय से हिल गई। मस्तिष्क में हजारों डंक एक साथ चुभन देने लगे पर दूसरे ही क्षण आत्मघाती विचारों को परे फेंकती उठ खड़ी हुई और बुदबुदाई –मैं अपने भाग्य का सृजन स्वयं करूंगी।  



शनिवार, 25 अगस्त 2018

संस्मरण 2 :आश्चर्य

प्रकाशित
साहित्य सुधा -साहित्यकारों की वेब पत्रिका 
अंक अगस्त -2018 

http://www.sahityasudha.com/articles_aug_2nd_2018/sansamaran/sudha_bhargava/ashcharya.html.pdf



आश्चर्य पर आश्चर्य 

सुधा भार्गव

14मई ,2017

     मेरे छोटे बेटे को आश्चर्य पर आश्चर्य देने की आदत है। उसकी पत्नी भी उसका खूब साथ देती है। अचानक झोली में आन पड़ी खुशियों का भार सँभालना कभी कभी मुश्किल भी हो जाता है। पर इतना अवश्य है कि एक अरसे तक आश्चर्य के सम्मोहन से रोम -रोम पुलकायमान रहता है।  
मुझे अच्छी तरह याद हैं बेटे की शादी के बाद हम पति- पत्नी  पहली बार उससे मिलने अमेरिका गए थे। एक दिन रात को भोजन करने के बाद वह बोला-“पापा मैं अभी आता हूँ।’’वह और बहू खुसर-पुसुर करते गायब हो गए। हम सोचते ही रहे—इतनी रात गए  अचानक कहाँ जाना पड़ गया! ऑफिस से आने के बाद तो वह हमारे बिना कहीं जाता ही नहीं है ।
करीब एक घंटे के बाद दोनों लौट कर आए। चेहरे पर हर्ष की लहरें तरंगित हो रही थीं । एकाएक इतना उल्लास!  
     बेटा खनकती आवाज में बोला-“पापा,खिड़की से जरा बाहर झांक कर तो देखो।”
     “दरवाजे पर तो कार खड़ी सी लगती है।कोई आया है क्या?
     “यह मैंने आपके लिए खरीदी है। कल से खूब घूमेंगे।“
     “अरे वाह! तूने कार खरीद ली।”  वे बच्चे की तरह चहक पड़े और बेटे को गले लगा लिया ।
     कुछ वर्षों के बाद वह पूना आ गया। उन दिनों हम दिल्ली रहते थे। सर्दी के दिन थे इसलिए जल्दी खा-पीकर लिहाफ में दुबक जाते।रूम हीटर और साथ में टी॰ वी। दोनों चालू कर देते। उस रात भी टी॰ वी॰ बंद कर सोने का उपक्रम कर ही रहे थे कि दरवाजे की घंटी बज उठी ।हम दोनों ही एक बारगी तो बुरी तरह चौंक पड़े, फिर मैं बोली-“सो जाओ—सो जाओ। रात के बारह बजे हमसे मिलने कौन आयेगा?किसी ने गलती से बजा दी है।” 
एक मिनट बाद फिर घंटी बोल पड़ी। साथ ही मेरा मोबाइल भी घरघरा उठा –हेलो माँ! कैसी हो?
     “कौन,मन्नू! इतनी रात गए तेरा फोन! सब ठीक तो है। मैं अनहोनी की  आशंका से ग्रसित हो उठी।
    “हाँ माँ।’’
    “जरा मन्नू  से बात करो जी ,मैं जाकर दरवाजे पर देखती हूँ –।’’ मैं फुर्ती से कमरे से बाहर हो गई।
    ये ज़ोर से बोले –“दरवाजा न खोलना।’’
    मैं सांस रोके दरवाजे के पास खड़ी थाह लेने लगी, “कौन हो सकता है? निश्चय ही दरवाजे से बाहर कोई खड़ा है।”
    तभी दरवाजा किसी ने ज़ोर से थपथपाया। मैंने कड़ककर पूछा–“कौन है?”
    धीमी रेशम सी आवाज आई –“माँ मैं हूँ।”
    “तू मन्नू !अभी तो पूना से तेरा फोन आया था। यहाँ कैसे हो सकता है?”
    “माँ मैंने यहीं से फोन किया था। दरवाजा खोलो।”
    पीछे से दहशत भरा स्वर गूँजा ---दरवाजा न खोलो। मुझे रोकने को मेरे पति  छटपटाते मेरी  तरफ दौड़े दौड़े आए। तब तक मैं दरवाजा खोल चुकी थी। मन्नू अंदर आते ही बोला- “पापा हैपी बर्थ डे।” एक मिनट को उन्हें अपनी आँखों पर विश्वास न हुआ पर दूसरे पल ही वास्तविकता का भान हुआ तो गदगद हो बेटे को अपनी बाहों के घेरे में ले लिया।
    “बेटा आने की खबर भी न की।” प्यार भरा लहजा शिकायत से भरपूर था ।
    “ओह प्यारे पापा, आपके जन्मदिन पर अचानक आकर दोनों को चकित कर देना चाहता था।”
    “इतना बड़ा हो गया पर तेरी सरप्राइज़ देने की आदत गई नहीं। अच्छा अचानक आना कैसे हुआ?
    “आपकी बर्थडे के लिए ही आया हूँ। पापा यह रहा आपका गिफ्ट।”
   “बेटा सबसे बड़ा गिफ्ट तो यही है कि तू हमसे मिलने आ गया।” बड़ी देर तक मैं उसके हाथ को ममता से सहलाती रही।
    हाँ अब तो वह दो बच्चों का बाप हो गया है। पर वक्त - बेवक्त दूसरों को हैरानी में डालना नहीं छोड़ा है। ऐसी प्लानिंग करता है कि किसी को कानों-कान खबर हो ही नहीं पाती।
     कल ही हम गोवा से लौटकर आए हैं। दो हफ्ते पहले वह बोला था – “माँ गोवा चलोगी?”
“हाँ हाँ क्यों नहीं। बाहर गए हुए भी बहुत दिन हो गए हैं।” मैंने साधारण तौर से कह दिया।
गोवा जाने के लिए 14 मई की हवाई जहाज की टिकटें उसने बुक करा दीं।
    उस दिन बड़े सवेरे बेटी का फोन आया–“माँ, हैपी मदर्स डे। सुनते ही दिमाग को जोरदार झटका लगा और वह बड़ी तेजी से काम करने लगा। अब समझ में आया बेटे ने गोआ जाने के लिए 14 तारीख ही क्यों चुनी। अधरों पर वात्सल्य में डूबी मुस्कराहट फैल गई।
    संयोग की बात, इस ट्रिप में तीन माँ साथ साथ थीं।मैं, मेरी पोतियों की माँ और मां की माँ –मतलब मेरी समधिन जी। गोवा ट्रिप की बजाय इसे मदर्स ट्रिप कहा जाय तो ठीक रहेगा।
अब मुझे अगले आश्चर्य का इंतजार है।बेटे का  हर सरप्राइज़ मेरी  उम्र बढ़ा देता है। ऐसा लगता है जैसे ईशवर ने मेरे कंधे पर अपनी उँगलियों की छाप छोड़ दी हो।

समाप्त  


शनिवार, 25 नवंबर 2017

कविता-2


 साहित्यिकी अंतर्जाल पत्रिका में प्रकाशित 
लिंक -https://sahityikee.wordpress.com/2017/11/09/anaath-se-sanaath-sudha-bha

घर को व्यवस्थित करते हुये
मुझे मिला
पीतल का एक कटोरदान
न बन सकी उसकी कद्रदान ,
पुराने फैशन का समझकर
नाक भौं सकोड़कर
पीछे  सरका दिया था
पता न था एक दिन
यही हो जाएगा
मेरे लिए वरदान। 

बहुत देर तक
उसे थामे रहे हाथ
छोड़ने को तैयार न थे
उसका साथ  
फिसलती उँगलियाँ
ढूँढने की कोशिश में थीं
शायद माँ के हाथों की छाप
जो तोड़ गई थी रिश्ता
बिना कहे कोई बात।

अचानक पैदा हुई एक थाप  
मोहभरा संगीत भरा नाद
मोह से उपजी सिहरन
सिहरन से थी
अंग अंग में थिरकन
उसकी गूंज में मैं खो गई,
आभास हुआ
वह मेरे कंधों को छू रही है
बालों में उँगलियाँ घूमा रही है
आशीर्वाद की धूरी पर
मंत्र फुसफुसा रही है।

उसने बड़े प्यार से
अपने हाथों को बढ़ाया
लड्डुओं का कटोरदान
मुझे धीरे से थमाया  
अल्हड़ बालिका सी मुस्कुराकर
मैंने सीने से उसे लगाया ।
पलभर की छुअन में
मैं रम गई
एक बार फिर
अनाथ से सनाथ हो गई।

समाप्त 

बुधवार, 29 मार्च 2017

हास्य-व्यंग -1

प्रहसन 
प्रकाशित-http://hindi.pratilipi.com/sudha-bhargav/sirdard
सिरदर्द /सुधा भार्गव
पात्र -सास-बहू 
-मैं चली---मैं चली--। _(ठुमकती हुई सास बोलती है और इठलाती कदम बढ़ाती है)
बहू अरे कहाँ चलीं?
-डीयर
प्यार के सागर में ज्वार भाटा आता रहा
 तेरा कंजूस ससुरा मुझे सताता रहा
ज़िंदगी बिता दी तेरे मियां को पालने में
मेरे भी अब खाने -खेलने के दिन आ गए
ले घर की चाबियाँसँभाल चकला-बेलन
मैं चली---मैं चली-----।
बहू-उफ,कहाँ सवारी चली।
सास-क्लब और कहाँ ! हाँ याद आया,कल मेरी पंचासवीं वर्षगांठ है। बहुत कुछ कहना है बहुत कुछ लेना है। तू तो बस वही हीरों का हार दे दीजो जो तुझे अपनी माँ से मिला है।
-वह तो असली नहीं नकली है सासु जी ।
सास-ओह तेरी बातों ने  तो मेरे सिर में दर्द कर दिया । तेरे बाप ने तो दिन दहाड़े हमें मूर्ख बना दिया। जल्दी से एक कप चाय पिला।
-अभी लाई।
-क्या कहा !आधे घंटे बाद लाई?
-लो सठियाना शुरू हो गया ।  (बड़बड़ाती बहू जाते-जाते लौट पड़ती है।)

-सासु जी,इलायची की चाय लाऊं या मसाला चाय । तुलसी की चाय भी अच्छी होती है।
-तीनों को एक साथ घोंट कर बना ले। बस जल्दी ला।
-कप में लाऊं या गिलास में?
-बड़े से कप में ला । शान से पीऊंगी।
-अमेरिकी कप चलेगा या भारतीय ?
-अमेरिकन कोरल वाला कप । 
-चाय मीठी लाऊं या फीकी?
-तू तो जाने है ,डॉक्टर ने फीकी ही बताई है पर कभी कभी मीठी चाय पीने से कुछ न होवे। दो चम्मच तो डाल ही दे।
-चीनी डालूँ या शुगर फ्री टेबलेट डालूँ सासु जी?
-ओह सासु जी की बच्ची ,तेरे प्रश्नों की बौछार से तो मेरा सिर फटा जा रहा है। कोई टेबलेट ला कर दे।
-एस्परीन लाऊं या सेरिडोन ?
-हायहाय ,लगता है क्लब जल्दी ही जाना पड़ेगा। सिर को दबाती सास उठ जाती है।
-आप जा रही हैं सासु जी ,टैक्सी मंगाऊं?
-हाँ,मंगा दे।
-ओला मंगाऊ या पोला?
-मुझे न चाहिए  तेरी ओला-पोला । कुछ और देर तेरे पास बैठी रही तो पागल ही हो जाऊंगी। मैं खुद ही रास्ते से ले लुंगी।
(सास कमर पर हाथ रखे धीरे -धीरे जाती है।)
आँखों से ओझल होते ही बहु खुशी से हाथ हवा में नचाती बोलती है-  
-जाओ,जा ओ। हा हा चला गया सिर दर्द।
बोले तो कलेजे पर बंदूक चलती है
छींकती है तो धम से छ्ज्जा गिरता है
खांसी के धमाके से शीशी टूटती है
इसके होने से मेरी तकदीर फूटती है।
(माथे पर हथेली टिकाए बहू का प्रस्थान।

हास्य-व्यंग 2

चुटकियाँ
एक अनाड़ी कवि धुरंधर कवि के पास गया और बोला-
मेरे भगवान
दो वरदान
मेरी  कविता छप जाए
जन जन
मेरे गुण गाएँ
बस एक बार एक बार
देख लो कविताएं मेरी ।
कवि जी ने हाथ बढ़ाया
कागजों पर चश्मा दौड़ाया
बोले-
पढ़िये ,परखिये फिर माँजिए।
अनाड़ी घर पहुंचा
पुन: कवितायें पढ़ीं परखीं  
फिर जोश में चिल्लाया
अरी मेहरी
जूना और राख ला
मेरी कविताओं को माँज-माँज
चमका दे जरा।
प्रकाशित -मार्च 2017 
http://hindi.pratilipi.com/read?id=5785897273393152&ret=/sudha-bhargav/meri-kavita

हास्य-व्यंग :4

चुटकियाँ /सुधा भार्गव 

1-डोरे 

दूसरी सहेली से बोली
पड़ोस का लड़का
डोरे डालने में माहिर है ।
दादी ने सुना तो खिल उठी
तुरंत नौकर को बुलवाया
तानाशाही हुकुम सुनाया-
तीन- चार लिहाफ उठाओ
उन्हें पड़ोसी के घर रख आओ
कहना-
उनमें अच्छी तरह डोरे डलवा दें
सुना है
उनका छोकरा डोरे डालने में माहिर है।

प्रकाशित -मार्च 2017 
 http://hindi.pratilipi.com/read?id=6392041578692608&ret=/sudha-bhargav/dore



हास्य -व्यंग 3


गयो –गयो री सास तेरो राज /सुधा भार्गव
प्रतिलिपि लेखनी- हास्य - व्यंग्य अंक में प्रकाशित जिसकी लिंक है -"http://hindi.pratilipi.com/read?id=4659997366550528&ret=/sudha-bhargav/gayo-gayo-ri-saas-tero-raj
गोमती  बड़े शौक से अपने बहू बेटे से मिलने भारत से लंदन गई। एक सुबह वह बड़े आराम से चाय की चुसकियाँ ले रही थी कि बेटे की आवाज सुनाई दी-
-अरे मेरा तौलिया कहाँ है ?
-अंदर ही होगा ।
-नहीं मिल रहा ---।
-मेरे बिना तो कोई  काम ही नहीं होता । बहू बड़बड़ाई ।
-तरकीब है तुम्हें अपने पास बुलाने की।गोमती सासू ने चुटकी ली।  
-नहीं नहीं ,बहू शर्मा गई ।
-अच्छा जाओ मेरे बेटे से पूछो।
बहू ऊपर चली गई पर उसका काम पीछे रह गया । अब सास का बड़बड़ाना शुरूहे भगवान इतनी देर लग गई। मुझे भी क्या सूझी जो मैंने उसे ऊपर भेज दिया। अब उसका काम कौन निबटाए। यहाँ नौकर तो मिलते नहीं और मुझे बर्तन माँजने की आदत नहीं । डिश वाशर सुनते हैं अगले माह खरीदा जाएगा।हे भगवान तब तक कैसे काम चलेगा। विदेश आए 15 दिन हो गए, अब तक तो ऐसे फालतू कामों  से अपने को बचा ही रही हूँ । वेक्यूम क्लीनर मुझे इस्तेमाल करना आता नहीं सो इस सफाई से भी बच जाती हूँ।
पर कब तक सासू जी बचतीं –--!
उस दिन बेटा थकान मिटाकर उठा ही था  बहू बोली जरा सुन रहे हो जी ,ये तवा कढ़ाई मुझसे साफ नहीं होते।
अंदर से सासू माँ कुलबुला उठी सास से काम करवाने का तरीका यह अच्छा है बेटे के हाथ में झाड़ू या कढ़ाई पकड़ा दो ,खटिया से लगी सास सीधी तन कर खड़ी हो जाएगी । अपनी बात पर फिर वह खुद ही हंस पड़ी और कमर पकड़ते हुए बोली - लो भैया,अब तो उठना ही पड़ेगा। उसके अभिनय पर बेटा भी मुस्कुरा पड़ा।
-अच्छा बहू तुम साबुन लगाती जाओ मैं धोती जाऊँगी। मजबूरी से उसे बोलना ही पड़ा। पर बर्तन धोने में भी नानी याद आ रही थी।सास होकर ऐसा फालतू का काम।  अपनी इज्जत भी छोटी होती नजर आ रही थी।
एक छुट्टी के दिन बेटे ने सफाई अभियान शुरू कर दिया।  बेटे को काम करता देख गोमती को न पैरों का दर्द याद रहा और न वहाँ की ठंड । उसका हाथ बंटाने को चल दी।
पोतियाँ भी काम में हाथ बँटाती पर दादी का दिल जलता। मैंने इनकी उम्र में चौके झाँका तक न था और ये फूल सी बच्चियाँ हाय सलाद काटते काटते कहीं अपनी उंगली न काट ले । दूसरी को तो फुल्का भी बनाना पड़ जाता है । कहीं उंगली में छाला न पड़ जाए।
उसे अपनी जान हमेशा सूली पर  लटकी नजर आती । ज्यादा रोका-टोकी करने से बहू यदि जबाव दे तो भी बुरा और वह अकेली काम करे तो भी गोमती अपने को अपराधिन महसूस करती। हाय राम अकेली जान हजार काम बहू की शारीरिक काम की भी तो एक सीमा है। सब कुछ समझते हुए भी नौकरों की आदत से मजबूर।   
एक दिन कुछ भारतीय मेहमान डिनर पर आ गए । झूठे बर्तनों का पहाड़ लग गया। गोमती समझ गई आज तो इस पहाड़ के नीचे आए बिना वह न रह पाएगी।
झुंझलाती बोली नियम होना चाहिए : आते जाओ ,खाते जाओ ,बर्तन मलते जाओ । यहाँ के रहने वाले तो ऐसा ही करते हैं मगर इंडिया के लाटसाहबों को कैसे समझाएँ। सोचते हैं यहाँ भी उनके बाप के नौकर बैठे हैं।
मेहमानों के जाने के बाद वह बहू का साथ देने लगी। बहू बर्तन बहुत अच्छे से धोती और सास  खाना पूर्ति करती । लापरवाही के कारण एक बर्तन में चावल लगे रह गए।
-मम्मी जी इन्हें पानी में भींगने डाल दीजिए,तभी झूठन हटेगी। टोक दिया बहू रानी ने।  
कहा तो उसने ठीक ही था पर सास  भी सफाई देने से बाज नहीं आई देखो मैं कोई कुशल महरी तो हूँ नहीं । मैं तो केवल सहायता कर रही हूँ। मीनमेख तो निकालो मत। न पसंद आए तो दुबारा धो लो । तुम्हें यहाँ आए साल भर होने को आया। कम से कम एक साल की ट्रेनिंग तो मिल गई है। मुझे ट्रेनिंग नहीं लेनी । मैं तो जल्दी अपने गाँव भाग जाऊँगी । बस बोलती जा रही थी और जबर्दस्ती चेहरे पर मुस्कान भी लाने की कोशिश कर रही थी ताकि बहू उसकी बात गंभीरता से न ले।  
इत्तफाक से बर्तन धोकर उसने  वहाँ रख दिये जहां झूठे बर्तन रखे जाते थे । उसे  इसका पता भी न था । बहू ने तुरंत  टोक दिया अरे यहाँ तो झूठे बर्तन रखे जाते हैं।
तभी सासू को याद आया
गयो-गयो री सास तेरो राज जमाने तेरी यही बतियाँ ---।
मजे से गुनगुनाती बोली बहू ,तुमने यह गाना सुना है गयो गयो --- री सास तेरो राज जमाने
-क्या मतलब मम्मी जी--।
-इंगलिश स्कूल की पढ़ने वाली भला तुम क्या समझोगी। पर मैं  तुम्हें समझाकर ही रहूँगी। बच्चों की तरह हंसी ठिठोली सी करती सास  बोली।   
मैं फिर से गाती हूँ ---ध्यान से सुनो।
गयो-गयो री सास तेरो राज जमाने तेरी ये ही बतियाँ
सासु पानी भरने जाए सवेरे ,बहुअल दे लुढ़काये
गंदों-गंदों पानी है तेरो सास जमाने तेरी यही बतियाँ ।
सास ने गाने के बहाने बहू की ओर बहुत कुछ सरका दिया था । पता नहीं जानकर भी अंजान बनते हुए या  कम उम्र ,दुनिया के गहरे काले धब्बों से अंजान, बस सास के अंदाज को देखती रही फिर उसके चेहरे पर  भोली सी मुस्कान फैल गई मानो कुछ हुआ ही न हो।  वह मुस्कान सास को बड़ी भली लगी। उसमें वह नहा सी गई।  आखिर थी तो उसकी बहू ही जिसे वह बड़े अरमानों से अपने बेटे के लिए पसंदकर अपने घर लाई थी।  
असल में सास बहू का रिश्ता बहुत प्यारा और अंतरंग सहेली जैसा है । विचारों में अंतर जरूर हो सकता है पर दोनों के रिश्ते स्नेह व समझदारी के धागों में गूँथे हों तो मित्रों घर में सुख ही सुख बरस पड़ता है। 
समाप्त