मेरी कहानियाँ

मेरी कहानियाँ
आर्टिस्ट -सुधा भार्गव ,बिना आर्टिस्ट से पूछे इस चित्र का उपयोग अकानून है।

सोमवार, 20 जुलाई 2020

पूछो तो सच11


नीला आकाश 
सुधा भार्गव 
    भारतीय संस्कृति और परम्पराएं अपने में बड़ी अनोखी हैं।माँ -बाप जब तक सशक्त रहते हैं बच्चों की सहायता करने की कोशिश  करते हैं।  दिन शुरू होता है तो उनकी बातों से और रात  ख़तम होती है तो उनकी यादों में।  जब यही बच्चे सशक्त हो जाते हैं तो अशक्त माँ-बाप के मजबूत कंधे बन जाते हैं। कोरोना के समय भी यही हो रहा है।  घर -घर बुजुर्गों का ध्यान रखा जा रहा है या जो ध्यान नहीं रखते थे वे सीख रहे हैं।  दुनिया वाले इसे नहीं समझ पाते। 
    न जाने क्यों आज मुझे उस कनेडियन नर्स की याद आ रही है जो वर्षों पहले कनाडा में शाम को घर पर  पोती को देखने स्वास्थ्य विभाग से आई थी। मैं उन दिनों ओटवा में ही थी। उसने हमारे घर आये नवजात शिशु की जांच की। नए बने माँ-बाप माँ-बाप को पालन पोषण सम्बन्धी तथ्य बताये। दो घंटे तक समस्यायों का समाधान करती रही मैं इस व्यवस्था को देख बहुत संतुष्ट हुई पर मुझे एक बात बहुत बुरी लगी
नर्स ने पूछा-घर मेँ कोई सहायता करने वाला है?
"हाँ,मेरे सास-ससुर भारत से आए है।" बहू बोली।
"कब तक रहेंगे?"
"3-4 माह तक।"
"क्या वे तुम्हारी वास्तव मेँ सहायता करते हैं?"
"सच मेँ करते हैं।"
"पूरे विश्वास से कह रही हो?"
"इसमें कोई शक की बात ही नहीं है।"
"ठीक है,तब भी शरीर से कम और दिमाग से ज्यादा काम लो।"
   नर्स शंकित हृदय से  मुझसे बहुत देर तक कुछ  जानने की कोशिश करती रही पर कंकड़-पत्थरों  के अलावा उसके कुछ हाथ न लगा।   
    न जाने ये पश्चिमवासी सास –बहू के रिश्ते को तनावपूर्ण क्यों समझते हैं?जिस माँ की बदौलत मैंने प्यारी सी पोती पाई उसे क्यों न दिल दूँगी। इसके अलावा माँ सबको प्यारी होती है। बड़ी होने पर जब अवनि देखेगी कि मैं उसकी माँ को कितना चाहती हूँ तो वह खुद मुझे प्यार करने लगेगी।   दादी अम्मा कहकर जब वह मेरी बाहों मेँ समाएगी तो खुशियों का असीमित सागर मेरे सीने मेँ लहरा उठेगा। शायद उस नर्स ने कभी नीला आकाश देखा ही न था  । 

शनिवार, 18 जुलाई 2020

पूछो तो सच -10


हमारा लीडर
सुधा भार्गव

मित्रों आज घर में बैठे बैठे मुझे अपने लीडर की याद आ गई ।बात उन दिनों की है जब
मैं बी. ए. की छात्रा टीकाराम गर्ल्स कॉलेज अलीगढ़ के छात्रावास में रहकर पढ़ा करती थी । छात्रावास कालिज की तीसरी मंजिल पर था । एक कमरे में चार -चार लड़कियाँ रहती थीं । कमरा काफी बड़ा था इसलिए कोई असुविधा नहीं थी । लेकिन एक रात हमारे लिए डरावने -डरावने सपने लेकर आई । लगा कमरे से बाहर कोई चहलकदमी कर रहा है ,फुसफुसा रहा है। ख्यालों की खिचड़ी पकने लगी -एक नहीं दो नहीं,तीन -चार चोर तो जरूर होंगे जो हमें लूटने की फिराक में हैं । दिसंबर का महीना --चिल्लाएँगे तो कानों तक आवाज भी नहीं पहुंचेगी ,सिर तक लिहाफ ओढ़े वार्डन और टीचर्स खर्राटे ले रही होंगी ।
हमने कमरे की चारों ट्यूवलाइट जला दीं और ज़ोर -ज़ोर से बातें करके चोरों के दिमाग में यह बात बैठानी चाही कि जाग पड़ गई है सो वे भाग जाएँ ।हम भी पौ फटने का इंतजार करने लगे । उजाला होते ही खिड़कियाँ खोलकर बाहर की ओर झाँकने लगे । खाना बनाने वाले महाराज को ऊपर आता देख सांस में सांस आई और कमरे का दरवाजा खोल दिया । उन्हें घेरकर हम बोले-”महाराज --महाराज रात में चोर आए थे ।”
इतने में वार्डन आ गई । खिल्ली उड़ाते हुये बोली -“उनकी आँखों में लाल मिर्च क्यों नहीं झोंक दीं ।”
“बहन जी क्या बात करती हैं । चोर क्या आकर कहेंगे -लो हमारी आँखों में मिर्च भर दो ।” महाराज खीज उठा ।
हम लड़कियां तो अवाक सी वार्डन की ओर देखती ही रह गईं । यह बात प्रिंसपाल के कानों तक भी पहुँची। तीन -चार लोगों की जांच समिति आई और चौकीदारों को अधिक सजग रहने का आदेश दे दिया गया । एक बात हम समझ गए थे कि अपनी लड़ाई हमें खुद लड़नी होगी ।
हमने वास्तव में ही रसोईया महाराज से पिसी लाल मिर्च लेकर मिर्चदानी में भर ली । उसको एक थैले में डालकर फल काटने का चाकू भी रख दिया । निश्चय किया इस थैले को कंधे पर लटकाकर बारी -बारी से लड़कियां पहरा देंगी । छात्रावास का नियम था कि रात को ग्यारह बजे लाइट्स बंद करके सोना पड़ता था । लेकिन उस दिन तो बारह बज गए और बिजली जल रही थी । परेशान सी वार्डन आई और पूछा --
“लड़कियों यह चहल -पहल कैसी ---और यह झोला कंधे पर क्यों ?इसमें क्या भर रखा है ?”एक ही साँस में इतने प्रश्न !वह बौखलाई सी थी ।
सहपाठिन क्षमा बोली -“मैडम ,यदि आज रात चोर आ गए तो हमारे सामने दो ही रास्ते होंगे --आत्मरक्षा या आत्महत्या । आत्मसमर्पण करने से तो रहे ।”
“लेकिन इस थैले मेँ क्या है ?”सब्र का बांध टूटा जा रहा था ।
“आत्मरक्षा का समाधान!”
क्षमा ने अपने कंधे से थैला उतारा । उसमें से मिर्च , धारवाला चाकू निकालते हुये बोली-
“अपने लक्ष्य को पाने के लिए मेरे ख्याल से ये बहुत हैं !”
साहस व आत्मविश्वास से भरी बातों को सुनकर वार्डन चकित थी । साथ ही क्षमा जैसी दु:साहसी लड़की को देख दहशत से भर उठीं कि अनजाने में यह लड़की कोई गुल न खिला दे। हमारी तो वह लीडर हो गई। पर वह लीडर आज की लीडर नहीं । न तो कोरोना को भगा सकती है और न पिंजरे में बंद हम जैसे पंछियों को मुक्त करा सकती है।
यह कैसी मजबूरी है !

पूछो तो सच-6




जन्म -8मार्च,2017
     
    आज मैंने ज़िंदगी के 75 वर्ष पूरे कर लिए हैं। बड़ी  सुबह ही  क्लिक -क्लिक की आवाज से नींद टूट गई। शुभकामनाओं का तांता लगा हुआ था। किसी की आवाज सुनाई दी तो किसी के शब्द दिखाई दिए। कुछ ने फेस बुक पर लंबी उम्र और  खुशहाल जीवन की कामना करते हुए उसकी वॉल पर वाक्य चिपका दिए।
     सब एक ही बात पूछते थे –आज किस तरह से अपना जन्मदिन मना रही हो?मेरा एक ही जबाब होता-बिना बच्चों के क्या जन्मदिन। दो तो बाहर ही हैं। जब एक साथ इखट्टे होंगे तभी कुछ होगा।
   बेटी का फोन आया –“माँ हैपी बर्थडे । शाम को क्या कर रही हो?”
   “करना क्या है!शाम को रोजाना की तरह सोनू के यहाँ  खाना खाने जाऊँगी। हाँ शाम को  जरूर अपने मित्रों को मिठाई खिलाऊंगी। तुम्हारी भाभी  से 15 मित्रों के लिए मिठाई लाने को कह देती हूँ। वह बाजार गई हुई है।”
   बहू  को फोन खटखटाया –“तुम कहाँ हो?कब तक आओगी?”
   “मुझे आने में देर लगेगी। बच्चे भी साथ है। कोई बात है क्या?”
   “मुझे अपने दोस्तों के लिए मिठाई चाहिए। सड़क पर इतनी भीड़ है कि उसे पार करने में ही पसीना आने लगता है। तुम लौटते समय ले आना। पाँच बजे तक मैं नीचे पार्क में जाऊँगी। वहीं सब इखट्टे होंगे।”
   “मैं तब तक घर आ जाऊँगी।
   शाम के पाँच बजने पर छोटी बहू  जब लौटकर नहीं आई तो मैं बेचैन हो उठी।
   “कितनी और देर लगेगी आने में?”मैंने झुंझलाते हुए फोन पर कहा।
   “बस आ रही हूँ।
   “मैं तैयार हूँ। नीचे आ जाऊँ!”
   “नहीं –नहीं आप नीचे नहीं आइए । मैं फोन करूं तब आइएगा।”
   मुझे बड़ा अजीब सा लगा। समझ नहीं आया कि ऐसे क्या काम आन पड़े कि सुबह से शाम हो गई। बच्चे भी परेशान हो गए होंगे।
   तभी यू॰के॰ से बड़ी बहू का फोन आ गया- “मम्मी जी हैपी बर्थडे!क्या कर रही हैं?”
   “कर क्या रही हूँ!अभी तो तुम्हारी दौरानी के आने  का इंतजार कर रही हूँ। कहा था 5बजे तक कुछ मिठाई लाकर दे दो। पाँच बजे आने को कह रही थी। अब साढ़े पाँच बजने वाले हैं। मुझे मालूम होता इतनी देर लग जाएगी तो मैं ही लाने का कुछ जुगाड़  करती। मुश्किल से एक घंटे तो हम दोस्त पार्क में बैठते हैं। देर होने से आधे तो चले ही जाएँगे।अच्छा फोन बंद करती हूँ। अभी उसको ही फोन लगाती हूँ। न जाने कहाँ अटक गई?
   मैंने गुस्से में  छोटी बहू को  फोन कर ही डाला-“तुम अब न लाओ । मैं नीचे जा रही हूँ। आज उनको ड्राई फ्रूट्स खिला दूँगी। मिठाई कल हो जाएगी।”
   “अरे नहीं,दो मिनट रुकिए मैं कुछ करती हूँ।मिठाई तो आज ही शोभा देगी।”
  बहू  की आवाज में परेशानी घुली हुई थी।  मेरा गुस्सा मोम की तरह पिघल पिघल बहने लगा।
   इस बार मोबाइल फिर बज उठा। बेटे की आवाज सुन चौंक पड़ी।
   “माँ,मैं आ रहा हू। घर पर हो न।’’
   “अरे इस समय तू क्यों आ रहा है। मैं नीचे जा रही हूँ। घूमने का समय हो गया है।”
  “नीचे तो रोज ही जाती रहती हो ---आज रहने दो।
   “अच्छा आजा। मैंने सोचा ,बिना बहू  और बच्चों के घर में उकता गया होगा।   
   बेटा आया। बोला-“माँ कैसी हो?”
   “ठीक हूँ। न जाने तेरी बहू  कहाँ रह गई। मैंने बुझे मन से कहा।
   “अभी आती होगी। इतने मेरे घर चलो।”
   “क्यों! वहाँ क्यों चलूँ?”
   “माँ,आप घर में पेंट करवाने की कह रही थीं। पेंटिंग  वाला आ रहा है। उससे कुछ बातें करनी हैं। रंग भी पसंद कर लो।”
 -मैं क्या रंग पसंद करूँ!तू ही कर ले।वही हो जाएगा।
 -ओह माँ चलो तो। दो मिनट ही तो लगेंगे।
 -अच्छा चल।
  मैं बेटे के घर की तरफ चल दी जो मुश्किल से 10 कदम की दूरी पर था । बड़े प्यार से वह मेरा हाथ थामें हुआ था।रास्ते भर खिचड़ी पकाती रही- 75 वर्ष की हो गई तो क्या हुआ!बुढ़ापा मुझसे कोसों दूर हैं। आ भी  गया तो क्या हुआ! मेरा क्या बिगाड़ लेगा –मैं तो बेटे के हाथों पूरी तरह सुरक्षित  हूँ।
    उसने अपना दरवाजा खटखटाया। दरवाजे के खुलते  ही अवाक रह गई। मेरी  करीब 20-25 सहेलियाँ बैठी हुई थीं।  मित्र तापसी बंगाली में जन्मदिन का गीत गा रही थी।सब तन्मय हो उसमें खोये हुए थे। 


   पास ही बहू  का बनाया केक मेज पर मुस्कुरा रहा था। सबके प्यार को देख मेरा हृदय भर आया।गाना समाप्त होते ही हैपी बर्थडे से घर गूंज उठा। लगा सबको एक साथ गले लगा लूँ। दिल में तो वे पहले ही बस चुके थे। इसके बाद का हाल तो फोटुयेँ ही बयान कर देंगी।






   इस  सरप्राइज़ पार्टी की तो मैं कल्पना ही नहीं कर सकती थी। इसका प्रबंध बच्चों और मित्रों ने इस प्रकार किया कि जिसका जन्मदिन था उसी को पता नहीं।असल में बहू घर से बाहर कहीं नहीं गई थी । उसने बाहर जाने का बहाना किया था ताकि मैं उसके फ्लैट में न पहुँच सकूं और चुपचाप  वह पार्टी की तैयारी कर सके ।  दोनों पोतियों ने भी भाग -भागकर खूब काम किया। मेहमानों से बार -बार खाने  की पूछती और जब नन्हें हाथों से उनकी प्लेट में कोई व्यंजन परोसती तो खाने का स्वाद दुगुन हो जाता। मेहमानों को देने वाले बैक गिफ्ट की पैकिंग और सज्जा इन दोनों ने ही की थी। और तो और बड़ी पोती ने तो सबके बीच कालीन  पर बैठकर गिटार पर हैपी बर्थडे की बड़ी प्यारी धुन सुनाई। तीन पीढ़ियों का संगम देखते ही बनता था। 
   आज सबसे बड़ा प्रश्न है कि नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी के मध्य बढ़ती खाई को कैसे पाटा जाय?इसके बारे में बहुत कुछ लिखा जा रहा है। मगर ज़्यादातर लोग युवा पीढ़ी से बड़े निराश है। उनके प्रति नकारात्मक सोच की दीवारें इतनी मजबूत हैं कि सकारात्मक सोच वहाँ पनपने ही नहीं पाती। किसी निर्णय पर पहुँचने से पहले समस्या की जड़ों तक जाना जरूरी है। कभी कभी जो दिखाई देता है वह वैसा होता नहीं। यदि लेखनी द्वारा ऐसा साहित्य परोसा जाय जो  बुजुर्ग  और नई पीढ़ी के मध्य की खाई को भर सकने में सहायक हो तो बहुत ही अच्छा है। 


शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

पूछो तो सच-1


एक ड्रेस की दुल्हनिया 

सुधा भार्गव   
   शादी तो मैंने अपने बच्चों की भी की और अनेक शादियाँ देखने को मिलीं पर  उस जैसी शादी नहीं देखी।
   न मिठाइयों के पैकिट न उपहारों की भीड़। न तिलक के नाम नोटों से भरे लिफाफों  की बौछार न लड़के की घड़ी-सूट-चेन । सगाई की रस्म बड़े शानदार होटल में की गई थी। मगर लड़की के माँ-बाप ऐसे घूम रहे थे जैसे किसी दूसरे रिश्तेदार की सगाई में  आए हैं। उनकी तरफ के लोग सगाई के अवसर पर करने वाले तिलक के लिफाफे हाथ में  लिए हुए थे। लड़की की माँ ने टोका-“ये लिफाफे अंदर रख लीजिये। लड़के वालों ने कुछ भी लेने से इंकार कर दिया है। लड़के का सपना था  कि वह केवल एक ड्रेस में  अपनी दुलहनिया लाएगा। ”
   जिसने भी सुना अचंभित !पैसे के लालच से निकलना आसान नहीं। मैं असमंजस में थी—सगाई पर अगर लड़के के माता –पिता लड़की के लिए साड़ी - जेवर लाये, साथ में मेवा-मिठाई ----- लड़की वाले कुछ न दें तो बड़ी किरकिरी होगी।
    मैं लड़की वालों की तरफ से थी। हम सब होटल में आ चुके थे। लड़के वालों का इंतजार था। वे दूसरे शहर से आने वाले थे। सबकी आँखें दरवाजे पर लगी थीं। वे इसी होटल में रुके मगर अपने रहने -सहने का इंतजाम उन्होंने खुद किया ।  सगाई में सबके खान पान का खर्चा भी उनकी तरफ से था।
  जो भी देखा अविश्वसनीय । वे बस 10 लोग थे। कोई चमक-दमक ,ठसके बाजी नहीं। न साथ में भारी अटैचियाँ  और डिब्बे। तभी लड़की ने साधारण   वेषभूषा में अपनी भाभी के साथ हॉल में प्रवेश किया।  मंच पर लड़के –लड़की ने एक दूसरे को अंगूठी पहना दी  वह भी अपनी अपनी कमाई की। फिर नाच-गाने व शायरी  के प्रोग्राम अति व्यवस्थित रूप से हुए। जो उनके मित्रों ने संयोजित किए थे।
    हम आशा करते रहे , रोके की रस्म  में अब लड़के की माँ अपनी होने वाली वधू को साड़ी -जेवर पहनाए ---अब पहनाए मगर वह क्षण नहीं आया तो नहीं। एक बुजुर्ग महिला बेचैन हो उठी और उसने समधिन जी से पूछ ही लिया –“बहन जी रोके की रस्म कब करेंगी ?हम लोगों में तो रोका होता है। जिसमें ससुराल की तरफ से सौभाग्य सौगातें दी जाती हैं।”
     “अगर हम देने का सिलसिला शुरू कर दें तो लड़की वाले भी शुरू कर देंगे। हम इस लेनदेन के खिलाफ हैं। रही बहू को देने की बात तो उसे हम क्या दें! वह  हमारी हो गई है ,फिर तो हमारा सब कुछ उसी का है। फिर  मेरा बेटा भी तो अपनी दुलहनिया को एक ड्रेस में ले जाना चाहता है।”
बात खरी थी । सब अपने गिरहबान में झाँककर देखने लगे कौन कितना खरा है। चाहते हुये भी लोग परम्पराओं और रीति-रिवाजों का विरोध करने में अपने को असमर्थ पा रहे थे।
अगले दिन विवाह समारोह था। उस दिन होटल के खाने –पीने का प्रबंध लड़की वालों की तरफ से था। बारात आई ,उसका स्वागत हृदय से किया। परंपरा के अनुसार लड़की के पिता ने बड़ी नम्रता से अपने समधिन जी से कहा-आप हमारे मेहमान हैं। हमारी ओर से आपके खास मेहमानों के लिए कुछ उपहार हैं। वे आपको दे दें  या उन्हीं को दें।
   समधी जी बिफर पड़े-“किस बात के उपहार !ये सब लड़की वालों को लूटने की बातें हैं। आप बताइये ,हमारे पास किसी  बात की कमी है क्या जो आपसे लें? मेरे बेटे-बहू दोनों ही योग्यता में  समान हैं ,सामर्थ्यवान हैं । उन्होंने एक दूसरे को पसंद किया है फिर हम उनके चक्कर में  क्यों पड़ें!” वे अपनी बात कहते हुये बड़ी सहजता से हंस दिये। समधी-समधी पुलकित हो गले लग गए। देखने वाले कह उठे- हमारे समाज में यह एक अनूठी मिसाल है।
13:1:2019
बैंगलोर          मित्रों मेरे जीवन का एक सच पढ़िए