मेरी कहानियाँ

मेरी कहानियाँ
आर्टिस्ट -सुधा भार्गव ,बिना आर्टिस्ट से पूछे इस चित्र का उपयोग अकानून है।

मंगलवार, 11 दिसंबर 2018

साहित्य शिल्पी में प्रकाशित



भाग्य का खेल 
सुधा भार्गव 

यह कहानी कई साल पहले  साहित्यशिल्पी अंतर्जाल पत्रिका में छपी थी। जिसकी लिंक है - http://www.sahityashilpi.com/2010/01/blog-post_18.html

सुधा जी की यह कहानी बेशक हमें जाने पहचाने माहौल में ले जाती है, बड़े बूढों का -समाज से, अपनों से और कई बार अपने ही घर में उपेक्षित हो जाना हमारे लिए जाना पहचाना विषय है लेकिन सुधा जी की ये छोटी सी कहानी अपने अंत तक आते आते अचानक हमें चौंका देती है और हम अपने आप से से सवाल पूछने लगते हैं कि हम खुद जब इस मकड़जाल में फंसेंगे तो....। ये तो बहुत डरावना है। हम इस तो से बचना तो चाहते हैं लेकिन.... - सूरज प्रकाश-सम्पादन
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ओ आसरे –-रामआसरे -----।
-ओह माँ !तुम्हारी आवाज क्या कमरे से रसोई में पहुँच सकती है?मुझे ही रामआसरे समझकर कोई काम बता दो। कुछ दिनों को यहाँ आती हूँ ताकि तुम्हारा कोई काम कर सकूँ। कुछ तो मुझे सेवा का मौका दो।
-ओह चुन्नी ,तू न जाने क्या बक-बक कर रही है। अरे यह नौकर मेरे लिए ही रखा गया है। विक्की की सख्त हिदायत है कि वह पहले मेरा काम करे पर मेमसाहब के काम से उसे फुर्सत कहाँ?नौकर भी समझता है,मैं बेकार ,लाचार –बस एक बोझ हूँ। उसे बुला –ना --।
रामआसरे की जान अधर में। बेचारा डरते-डरते बोला-मेमसाहब ने बाजार भेज दिया था,अम्मा अभी गरम रोटी लाता हूँ।
वह रोटी बनाने लगा और चुन्नी बड़े प्यार से माँ को रोटी खिलाने लगी। जर्जर मन से थकी माँ---अकेली न खा सकी और चुन्नी से भी खाने का आग्रह करने लगी। बिना भावज के चुन्नी को खाना अच्छा न लगा।
बूढ़ी माँ भड़क पड़ी-अरे तू किसके चक्कर में पड़ी है। वह तो नाश्ता करती ही नहीं। मुझे -नौकर डबल रोटी कच्ची-पक्की सेककर भुजिया के साथ दे जाता है। उपदेश तो बहुत –यह मत खाओ—पेट में दर्द हो जाएगा। भूख तो लगती है। कैसे भूखी रहूँ।
चुन्नी जानती थी-माँ कड़वा सत्य बोल रही है पर उन्हें शांत करने के लिए इधर उधर की बातें करने लगी। पान और तंबाखू की शौकीन माँ को उसने बीड़ा लगाकर दे दिया। माँ की आँखों में आँसू आ गए। उसका हाथ पकड़ते हुए बोली –बेटा ,तू तो दो दिन बाद चली जाएगी फिर तो मुझे अकेले ही इस कमरे में ज़िंदगी काटनी होगी। नूतन अपने कमरे में रहती है। कमरा क्या है महल है। फ्रिज ,टी वी सभी तो है। बच्चे वही खाते-खाते टी वी देखते, खाली समय में कंप्यूटर चलाते हैं। खुद भी न जाने क्या क्या जूस फ्रिज से निकालकर पीती रहती है। मेरे लिए सेब नहीं खरीदे जाते।कहो तो सुनने को मिलता है –यहाँ तो मिलते नहीं हैं,शहर में मिलते है। अच्छा ला-- फोन मिला—हेलो –आभा,तुमने तो फोन ही नहीं किया। शाम को आओ तो दो किलो सेब लेती आना।
माँ अपनी बड़ी बहू को फोन करके सो गई। चुन्नी को भी भूख लगने लगी थी। वह रसोईघर में गई,जो कुछ मिला उससे पेट भर लिया। तभी कमरे  का दरवाजा खुला और उसने छोटी भाभी की आवाज सुनी-जीजी ,आपने खाना खा लिया क्या?
-हाँ,बहुत इंतजार किया। तीन बज गए तो सोचा—खा लूँ।
नूतन बड़े इत्मिनान से खाने बैठ गई। चुन्नी उसकी ओर देखती रह गई फिर सोचकर उठ गई –अपने ही तो हैं,यह तो मुझसे बहुत छोटी है –समय से सब समझ आ जाएगी।
माँ से उसने इस बारे में कोई बात नहीं की। उन्हें बताने का मतलब था –उन्हें दुखी करना। उनका समय तो पिता जी की मृत्यु के बाद ही जा चुका था। एक विशाल साम्राज्य की मलिका होते हुए भी विरक्तिवश जीते जी उसे अपने बहू-बेटों को सौंप दिया जिसका परिणाम ही वे भोग रही थीं।

दिन छिपते ही बड़ी बहू आभा और बेटा फल लेकर हाजिर हो गए। आभा की यह तारीफ थी कि सास के जबान हिलाते ही उनकी हर इच्छा पूरी करती थी। माँ ने भी अबकी बार बड़े बेटे के पास जाना चाहा परंतु वहाँ पहले से ही उसके ससुरालिया पौड़ लगाए थे, वे जाती कहाँ ? कहने को तो इस कमरे में हर तरह का आराम था –सजा सजाया कमरा ,फोन ,फ्रिज,फर्नीचर,झोलीभर पैसा। पर क्या वे सुखी थीं!
उस आधी रात अम्मा को भूख लगी। चुन्नी सेब  काटकर उन्हें देने लगी। पूछा-माँ कैसी हो?
-बेटा,मैं लालकिले के तहखाने में बंद वह शाहजहाँ हूं जिसकी मिल्कियत छीन ली गई है और तुम्हारी भाभी उस पर और उसके राज्य पर शासन करना चाहती है। भाग्य के इस खेल में मैं हार चुकी हूँ।
सुनकर चुन्नी सन्नाटे में आ गई।रोम-रोम एक अज्ञात आशंका से काँप उठा। माँ को 4-5 दवाएं दीं जिनकी वे आदी हो चुकी थीं। सबसे उनका जी भर चुका था पर दवाओं से नहीं। माँ डायजापाम लेकर खर्राटें भरने लगीं। चुन्नी उन्हीं के पास लेट गई। उनकी कमर में हाथ डालकर बुदबुदा उठी-माँ, मैं तुम्हें बहुत प्यार करती हूँ। मुझे तुम्हारे प्यार की जरूरत है। इस तरह नींद की गोली लेकर मुझे न भूली। जबकि वह जानती थी माँ सारे दुखों से छुटकारा पाने के लिए अपने को भूलने की कोशिश में है।
चुन्नी के पोर-पोर में टीस उठने लगी। काश!वह कुछ दिन माँ को अपने पास रख पाती! मगर रखती कैसे?वह तो एक पल को भी बेटों की नगरी से जुदा नहीं होना चाहती थी। सब समय तो उनकी आँखों में रहती है क्षमा और हृदय में लहराता है वात्सल्य का समुंदर। बड़े संकोच के साथ बेटी के यहाँ कुल मिलाकर दो माह रही होगी वह भी टुकड़ों-टुकड़ों में। कहती थी-कन्यादान के बाद बेटी के घर का निवाला गले में अटक जाता है। क्या एक वृदधा की मूक पीड़ा ,असम्मान की ज़िंदगी—इनकी चर्चा भाई के सामने करे। नहीं—नहीं --। उसने तो घर के साथ -। साथ माँ की बागडोर भी पत्नी के हाथों थमा दी अब तो वे उसी के रहमोकरम पर हैं।
चुन्नी क्या करे क्या न करे। खुद ही प्रश्न करती,खुद ही जबाव दे देती। इस मकड़जाल में उसकी जान अटककर रह गई।
उसके भी तीन बेटे है। अज्ञात भय से हिल गई। मस्तिष्क में हजारों डंक एक साथ चुभन देने लगे पर दूसरे ही क्षण आत्मघाती विचारों को परे फेंकती उठ खड़ी हुई और बुदबुदाई –मैं अपने भाग्य का सृजन स्वयं करूंगी।  



शनिवार, 25 अगस्त 2018

संस्मरण 2 :आश्चर्य

प्रकाशित
साहित्य सुधा -साहित्यकारों की वेब पत्रिका 
अंक अगस्त -2018 

http://www.sahityasudha.com/articles_aug_2nd_2018/sansamaran/sudha_bhargava/ashcharya.html.pdf



आश्चर्य पर आश्चर्य 

सुधा भार्गव

14मई ,2017

     मेरे छोटे बेटे को आश्चर्य पर आश्चर्य देने की आदत है। उसकी पत्नी भी उसका खूब साथ देती है। अचानक झोली में आन पड़ी खुशियों का भार सँभालना कभी कभी मुश्किल भी हो जाता है। पर इतना अवश्य है कि एक अरसे तक आश्चर्य के सम्मोहन से रोम -रोम पुलकायमान रहता है।  
मुझे अच्छी तरह याद हैं बेटे की शादी के बाद हम पति- पत्नी  पहली बार उससे मिलने अमेरिका गए थे। एक दिन रात को भोजन करने के बाद वह बोला-“पापा मैं अभी आता हूँ।’’वह और बहू खुसर-पुसुर करते गायब हो गए। हम सोचते ही रहे—इतनी रात गए  अचानक कहाँ जाना पड़ गया! ऑफिस से आने के बाद तो वह हमारे बिना कहीं जाता ही नहीं है ।
करीब एक घंटे के बाद दोनों लौट कर आए। चेहरे पर हर्ष की लहरें तरंगित हो रही थीं । एकाएक इतना उल्लास!  
     बेटा खनकती आवाज में बोला-“पापा,खिड़की से जरा बाहर झांक कर तो देखो।”
     “दरवाजे पर तो कार खड़ी सी लगती है।कोई आया है क्या?
     “यह मैंने आपके लिए खरीदी है। कल से खूब घूमेंगे।“
     “अरे वाह! तूने कार खरीद ली।”  वे बच्चे की तरह चहक पड़े और बेटे को गले लगा लिया ।
     कुछ वर्षों के बाद वह पूना आ गया। उन दिनों हम दिल्ली रहते थे। सर्दी के दिन थे इसलिए जल्दी खा-पीकर लिहाफ में दुबक जाते।रूम हीटर और साथ में टी॰ वी। दोनों चालू कर देते। उस रात भी टी॰ वी॰ बंद कर सोने का उपक्रम कर ही रहे थे कि दरवाजे की घंटी बज उठी ।हम दोनों ही एक बारगी तो बुरी तरह चौंक पड़े, फिर मैं बोली-“सो जाओ—सो जाओ। रात के बारह बजे हमसे मिलने कौन आयेगा?किसी ने गलती से बजा दी है।” 
एक मिनट बाद फिर घंटी बोल पड़ी। साथ ही मेरा मोबाइल भी घरघरा उठा –हेलो माँ! कैसी हो?
     “कौन,मन्नू! इतनी रात गए तेरा फोन! सब ठीक तो है। मैं अनहोनी की  आशंका से ग्रसित हो उठी।
    “हाँ माँ।’’
    “जरा मन्नू  से बात करो जी ,मैं जाकर दरवाजे पर देखती हूँ –।’’ मैं फुर्ती से कमरे से बाहर हो गई।
    ये ज़ोर से बोले –“दरवाजा न खोलना।’’
    मैं सांस रोके दरवाजे के पास खड़ी थाह लेने लगी, “कौन हो सकता है? निश्चय ही दरवाजे से बाहर कोई खड़ा है।”
    तभी दरवाजा किसी ने ज़ोर से थपथपाया। मैंने कड़ककर पूछा–“कौन है?”
    धीमी रेशम सी आवाज आई –“माँ मैं हूँ।”
    “तू मन्नू !अभी तो पूना से तेरा फोन आया था। यहाँ कैसे हो सकता है?”
    “माँ मैंने यहीं से फोन किया था। दरवाजा खोलो।”
    पीछे से दहशत भरा स्वर गूँजा ---दरवाजा न खोलो। मुझे रोकने को मेरे पति  छटपटाते मेरी  तरफ दौड़े दौड़े आए। तब तक मैं दरवाजा खोल चुकी थी। मन्नू अंदर आते ही बोला- “पापा हैपी बर्थ डे।” एक मिनट को उन्हें अपनी आँखों पर विश्वास न हुआ पर दूसरे पल ही वास्तविकता का भान हुआ तो गदगद हो बेटे को अपनी बाहों के घेरे में ले लिया।
    “बेटा आने की खबर भी न की।” प्यार भरा लहजा शिकायत से भरपूर था ।
    “ओह प्यारे पापा, आपके जन्मदिन पर अचानक आकर दोनों को चकित कर देना चाहता था।”
    “इतना बड़ा हो गया पर तेरी सरप्राइज़ देने की आदत गई नहीं। अच्छा अचानक आना कैसे हुआ?
    “आपकी बर्थडे के लिए ही आया हूँ। पापा यह रहा आपका गिफ्ट।”
   “बेटा सबसे बड़ा गिफ्ट तो यही है कि तू हमसे मिलने आ गया।” बड़ी देर तक मैं उसके हाथ को ममता से सहलाती रही।
    हाँ अब तो वह दो बच्चों का बाप हो गया है। पर वक्त - बेवक्त दूसरों को हैरानी में डालना नहीं छोड़ा है। ऐसी प्लानिंग करता है कि किसी को कानों-कान खबर हो ही नहीं पाती।
     कल ही हम गोवा से लौटकर आए हैं। दो हफ्ते पहले वह बोला था – “माँ गोवा चलोगी?”
“हाँ हाँ क्यों नहीं। बाहर गए हुए भी बहुत दिन हो गए हैं।” मैंने साधारण तौर से कह दिया।
गोवा जाने के लिए 14 मई की हवाई जहाज की टिकटें उसने बुक करा दीं।
    उस दिन बड़े सवेरे बेटी का फोन आया–“माँ, हैपी मदर्स डे। सुनते ही दिमाग को जोरदार झटका लगा और वह बड़ी तेजी से काम करने लगा। अब समझ में आया बेटे ने गोआ जाने के लिए 14 तारीख ही क्यों चुनी। अधरों पर वात्सल्य में डूबी मुस्कराहट फैल गई।
    संयोग की बात, इस ट्रिप में तीन माँ साथ साथ थीं।मैं, मेरी पोतियों की माँ और मां की माँ –मतलब मेरी समधिन जी। गोवा ट्रिप की बजाय इसे मदर्स ट्रिप कहा जाय तो ठीक रहेगा।
अब मुझे अगले आश्चर्य का इंतजार है।बेटे का  हर सरप्राइज़ मेरी  उम्र बढ़ा देता है। ऐसा लगता है जैसे ईशवर ने मेरे कंधे पर अपनी उँगलियों की छाप छोड़ दी हो।

समाप्त