मेरी कहानियाँ

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आर्टिस्ट -सुधा भार्गव ,बिना आर्टिस्ट से पूछे इस चित्र का उपयोग अकानून है।

शनिवार, 18 जुलाई 2020

पूछो तो सच -10


हमारा लीडर
सुधा भार्गव

मित्रों आज घर में बैठे बैठे मुझे अपने लीडर की याद आ गई ।बात उन दिनों की है जब
मैं बी. ए. की छात्रा टीकाराम गर्ल्स कॉलेज अलीगढ़ के छात्रावास में रहकर पढ़ा करती थी । छात्रावास कालिज की तीसरी मंजिल पर था । एक कमरे में चार -चार लड़कियाँ रहती थीं । कमरा काफी बड़ा था इसलिए कोई असुविधा नहीं थी । लेकिन एक रात हमारे लिए डरावने -डरावने सपने लेकर आई । लगा कमरे से बाहर कोई चहलकदमी कर रहा है ,फुसफुसा रहा है। ख्यालों की खिचड़ी पकने लगी -एक नहीं दो नहीं,तीन -चार चोर तो जरूर होंगे जो हमें लूटने की फिराक में हैं । दिसंबर का महीना --चिल्लाएँगे तो कानों तक आवाज भी नहीं पहुंचेगी ,सिर तक लिहाफ ओढ़े वार्डन और टीचर्स खर्राटे ले रही होंगी ।
हमने कमरे की चारों ट्यूवलाइट जला दीं और ज़ोर -ज़ोर से बातें करके चोरों के दिमाग में यह बात बैठानी चाही कि जाग पड़ गई है सो वे भाग जाएँ ।हम भी पौ फटने का इंतजार करने लगे । उजाला होते ही खिड़कियाँ खोलकर बाहर की ओर झाँकने लगे । खाना बनाने वाले महाराज को ऊपर आता देख सांस में सांस आई और कमरे का दरवाजा खोल दिया । उन्हें घेरकर हम बोले-”महाराज --महाराज रात में चोर आए थे ।”
इतने में वार्डन आ गई । खिल्ली उड़ाते हुये बोली -“उनकी आँखों में लाल मिर्च क्यों नहीं झोंक दीं ।”
“बहन जी क्या बात करती हैं । चोर क्या आकर कहेंगे -लो हमारी आँखों में मिर्च भर दो ।” महाराज खीज उठा ।
हम लड़कियां तो अवाक सी वार्डन की ओर देखती ही रह गईं । यह बात प्रिंसपाल के कानों तक भी पहुँची। तीन -चार लोगों की जांच समिति आई और चौकीदारों को अधिक सजग रहने का आदेश दे दिया गया । एक बात हम समझ गए थे कि अपनी लड़ाई हमें खुद लड़नी होगी ।
हमने वास्तव में ही रसोईया महाराज से पिसी लाल मिर्च लेकर मिर्चदानी में भर ली । उसको एक थैले में डालकर फल काटने का चाकू भी रख दिया । निश्चय किया इस थैले को कंधे पर लटकाकर बारी -बारी से लड़कियां पहरा देंगी । छात्रावास का नियम था कि रात को ग्यारह बजे लाइट्स बंद करके सोना पड़ता था । लेकिन उस दिन तो बारह बज गए और बिजली जल रही थी । परेशान सी वार्डन आई और पूछा --
“लड़कियों यह चहल -पहल कैसी ---और यह झोला कंधे पर क्यों ?इसमें क्या भर रखा है ?”एक ही साँस में इतने प्रश्न !वह बौखलाई सी थी ।
सहपाठिन क्षमा बोली -“मैडम ,यदि आज रात चोर आ गए तो हमारे सामने दो ही रास्ते होंगे --आत्मरक्षा या आत्महत्या । आत्मसमर्पण करने से तो रहे ।”
“लेकिन इस थैले मेँ क्या है ?”सब्र का बांध टूटा जा रहा था ।
“आत्मरक्षा का समाधान!”
क्षमा ने अपने कंधे से थैला उतारा । उसमें से मिर्च , धारवाला चाकू निकालते हुये बोली-
“अपने लक्ष्य को पाने के लिए मेरे ख्याल से ये बहुत हैं !”
साहस व आत्मविश्वास से भरी बातों को सुनकर वार्डन चकित थी । साथ ही क्षमा जैसी दु:साहसी लड़की को देख दहशत से भर उठीं कि अनजाने में यह लड़की कोई गुल न खिला दे। हमारी तो वह लीडर हो गई। पर वह लीडर आज की लीडर नहीं । न तो कोरोना को भगा सकती है और न पिंजरे में बंद हम जैसे पंछियों को मुक्त करा सकती है।
यह कैसी मजबूरी है !

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