मेरी कहानियाँ

मेरी कहानियाँ
आर्टिस्ट -सुधा भार्गव ,बिना आर्टिस्ट से पूछे इस चित्र का उपयोग अकानून है।

शुक्रवार, 21 अगस्त 2020

कहानी -अनोखी परंपरा

 


अनोखी परंपरा

सुधा भार्गव

    पति के सेवानिवृत होने के बाद रुकमनी ने बड़े शौक से विशाल बंगला बनवाया । साथ मैं बहू बेटे रहते थे। रिश्तों में आनंदधारा अविरल बहती थी। मुश्किल से 4-5 वर्ष ही उसने इस भवन मेँ बिताए होंगे कि पति की हृदयगति रुक गयी। वे इस संसार से विदा हो गए। वह रोती कलपती रही पर विधाता के कठोर नियम के आगे तो सिर झुके रहते हैं। उसे बैराग्य सा हो गया। बहू बेटे के जिम्मे घर गृहस्थी छोड़कर उसने गाँव मेँ बसने का इरादा कर लिया।

    गाँव मेँ उसके वृद्ध सास –ससुर रहते थे । बेटे के गम मेँ वे जीते जी मृतक समान हो गए थे । उसने उनके लिए शक्ति पुंज बनने का निश्चय कर लिया।

    बेटे ने बहुत समझाया –माँ,तुम शहर की   सुख सुविधा की आदी हो। गाँव के कष्टमय जीवन की झटकी झेल न पाओगी।

     उसका एक ही उत्तर था –जब तेरे पिता जी के माँ –बाप देहात मेँ रह सकते हैं तो तेरी माँ भी वहाँ रह लेगी। वे बड़े शौक से मुझे अपने घर में ब्याह  कर लाए थे । आज उन्हें मेरी जरूरत है । बेटे के पास कहने के लिए कुछ न था । उसे माँ की बात उचित ही प्रतीत हुई ।

     सास –ससुर के बुढ़ापे की लाठी बनकर रुकमनी गाँव के छोटे से मगर पक्के मकान मेँ रहने लगी । वृद्ध दंपति अपने व्यथित हृदय उसके सामने उड़ेलकर संतोष कर लेते । कभी अपने दुर्भाग्य पर आँसू बहाते,कभी अतीत की यादों मेँ खोकर मुस्कुरा देते । बेटे की मौत का रक्तरंजित खंजर उनके हृदय मेँ घुस चुका था । उसकी अथाह वेदना ने उन्हें गूंगा सा कर दिया था । माँ –बाप के जीते जी उनकी बेटा चला जाए इससे बढ़कर दुख और क्या हो सकता है। देखते ही देखते उनकी आँखों का तारा दूर गगन मेँ न जाने कहाँ छिप गया । अंदर ही अंदर वे घुलने लगे और एक दिन उनका पार्थिव शरीर भी मिट्टी मेँ मिल गया।

    अकेली पड़ जाने के कारण रुकमनी को पुन: शहर जाना पड़ा । पिछले दिनों उसके बेटे ने अच्छी ख़ासी तरक्की कर ली थी। बहू उसका पूरा फायदा उठा रही थी ।अधिक आराम और बेफिक्री की ज़िंदगी के कारण उसे अनेकों रोगों ने घेर लिया । जोड़ों के दर्द के कारण  उठना –बैठना भी तकलीफदेह था । 

    बेटा आफिस से आकर चहकता –माँ मेरे पास आकर बैठो ,अरे वैशाली ,हमारे लिए चाय बना दो और हाँ !सूजी के चीले बन जाएँ तो अच्छा है ।

       रुकमानी बहू की मदद के लिए उठना चाहकर भी न उठ पाती –अरे माँ कहाँ चलीं ?बबलू हाथ पकड़कर बैठा लेता । उसके दिमाग में एक ही बात छाई थी कि दादा –दादी के लिए  माँ ने अपना सुख छोड़ दिया अब वैशाली की बारी है।  वह सासु माँ का पूरा  –पूरा ध्यान रखे में दो –दो नौकर के होते हुए भी वैशाली को उनसे व्यवस्थित रूप से काम लेना नहीं आता था। वह सारा काम उनपर छोड़ कर सैर  सपाटे ,फोन करने में व्यस्त हो जाती । दिमाग झूठी शान का भँवरा हो गया था । अपने हाथ से एक गिलास पानी देने भी अपनी तौहीन समझती । उसकी दृष्टि से ट्रे लेकर किसी के सामने चाय –नाश्ता आदि पेश करना नौकरों का काम था । लेकिन पति के सामने उसकी एक न चलती ।

     पिछले दो दिनों से रुकमनी को बुखार था । लापरवाही से तिल का ताड़ बन गया और उसने  खटिया पकड़ ली । सद्व्यवहार के कारण रुकमनी की पड़ोसिनों से खूब बनती थी । उसकी बीमारी की खबर मिलते ही शुभ चिंतकों का तांता लग गया । दरवाजा खोलते –खोलते और चाय-पानी की पूछते –पूछते वैशाली की तो कमर ही दुखने लगी । उसके दोनों बेटे बाहर नैनीताल में पढ़ रहे थे,मियां –बीबी अकेले । चाहे जब घूमो ,चाहे जहां जाओ और टी॰ वी ॰ देखते –देखते सो जाओ ! आजादी ही आजादी !सास के आने से उसकी दिनचर्या में बाधा पड़ गई और वह बौखला गई।

      उस दिन वैशाली के पैरों में बड़ा दर्द था। अकस्मात दरवाजे की घंटी बजी। लंगड़ाते हुए उसने दरवाजा खोला

   अरे मौसी जी आप ,आइये—आइये। “  

   “कैसी है बहन रुकमनी ?”

   पहले से ठीक है “

  “तुम्हारा स्वास्थ्य कैसा है?”

   “मेरी तबियत का ही तो रोना है मौसी जी । इधर  अम्मा जी भी बीमार !मैं अपना तो कुछ कर नहीं पाती ,उनका कैसे करूं --!हाय राम----बड़ा दर्द है पिडलियों में सूजन भी आ गई है।“

   “वैशाली कुछ ज्यादा ही नाटक कर रही थी ,मौसी जी एक नजर में भाँप गई और बेरुखी से रुकमनी के कमरे की तरफ मुड़ गई।“

    शाम को खाना परोसते हुए वैशाली का रोज टेप रिकार्डर चालू हो जाता। नमक –मिर्च लगाकर पूर दिन की बातें बबलू के सामने उगल देना चाहती थी। बबलू उसका पति एक अच्छे श्रोता की तरह केवल हाँ –हूँ करता रहता । आज भी कुछ ऐसा ही हुआ।“

   “सुनते हो –हमारे पड़ोस मे जो  शर्मा जी रहते हैं उनकी पत्नी भी डॉक्टर है---बड़े भलमानस हैं। दोनों ही क्लीनिक जाते हैं ,लेकिन पीछे से उनकी बीमार माँ की देखभाल नहीं हो पाती ।“

     मन में तो बबली के आया कह दे –ऐसे डॉक्टर होने से क्या फायदा जो जग को तो ठीक करता फिरे और अपनी माँ के प्रति इतनी उदासीनता!जो माँ का न हो सका ,दूसरे का क्या भला करेगा। । यूं कहो –पैसे के पीछे दोनों भाग रहे हैं। पर अपनी आदत के मुताबिक केवल हूँ करके रह गया ।

      वैशाली ने फिर अपनी बात आगे बढ़ाई-“उन्होंने अपनी माँ को वृद्धाश्रम में छोड़ दिया है । हर माह वहाँ 2000हजार रुपए देते हैं । वे अपनी उम्र वालों के साथ रहकर बड़ी खुश हैं । शर्मा दंपति हफ्ते में एक बार उनसे मिल आते हैं।“  

    “तुम कहना क्या चाहती हो ?साफ –साफ बोलो।“

    “यही की अम्मा जी को भी वृद्धाश्रम में छोड़ दें तो कैसा रहेगा ?अब देखो न ,मुझसे तो अपना कुछ होता नहीं इनको क्या आराम दूँ । हम तो 2000 से भी ज्यादा इनके खर्चे को दे सकते हैं। ये भी खुश और हम भी खुश ।“

    “ओह ,अब मैं समझा। मेरी माँ तुम्हें गाए-बकरी लगने लगी है और तुम चाहती हो कि उसे जंगल में छोड़ दिया जाए। जहां वह रूखा –सूखा खाकर दिन गुजारे। मेरे याद में तड़पे तो उसकी चीख मेरे कानों से न टकराए। तुमको स्वछंद जीवन जीने की चाहत है । पति होने के नाते मुझे अपनी ज़िम्मेदारी मालूम है । अब उसे तो  निबाहना ही पड़ेगा।

   मैं माँ के नाम से वृद्धाश्रम में एक कमरा ही बनवा देता हूँ जो हमेशा हमारे परिवार के काम आएगा । कोई न कोई उसमें रहेगा ही । माँ के बाद मैं -तुम।मेरे –तुम्हारे बाद हमारे बहू –बेटे ---उसके बाद ---। घर की बहू होने के नाते जब तुम एक नई रीति को जन्म दे रही हो तो आगे की पीढ़ी को भी उसका अनुकरण तो करना ही पड़ेगा । चलो एक अलबेली परंपरा का जन्म ही सही ।“

     बबलू के संवाद चौकाने वाले थे । मानवीय मूल्यों को भुला देने वाली वैशाली ने कभी न सोचा था कि उसका फेंका पासा उसके पाले में ही आन पड़ेगा। उसे अपने कदम पीछे हटाने पड़े और फिर कभी वृदधाश्रम  का नाम अपनी जबान पर न लाई।“  

(प्रकाशित -सेवा समर्पण –मार्च 2006)

 

 

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें